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संतति शास्त्र

संतति शास्त्र

Santati Shastra

पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव द्वारा

स्रोत: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (उद्गम)

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पृष्ठ 178

प्रेम द्वारा उत्तम सन्तानकी उत्पत्ति ।

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है। जब हम प्रेमको मनकी शक्ति मानेंगे तो इसपर भी विचार करना होगा कि मनुष्यको हर बातका प्रेमी होना चाहिये। क्योंकि मन प्रत्येक बात पर जाता है। इसमें सन्देह नहीं कि मन हर एक बातोंपर अवश्य जाता है, परन्तु वह सबका प्रेमी नहीं बनता। उसको अपनी इच्छाके अनुसार खास खास बातोंका प्रेम होना पड़ता है, जैसे माताका प्रेमी, जातिका प्रेमी, देशका प्रेमी, ईश्वरका प्रेमी और स्त्रीका प्रेमी इत्यादि।

शरीर-रचना-शास्त्रसे पता चलता है कि प्रेमका स्थान, सर है। जितने तरहके प्रेम हैं सबका स्थान सरमें अलग अलग बना हुआ है। जिसका जितना जिस प्रकारके प्रेमका स्थान बली है, मनुष्य उसका उतना ही प्रेम होता है। सरमें प्रेमके जितने स्थान हैं सब बली क्यों नहीं होते? इस विषयमें वैद्यक-का मत है कि गर्भाधान समयमें जिस बातसे माता पिता दोनोंको प्रेम होता है, सन्तान उस बातकी श्रद्धल प्रेमी हो जाती है। जिस बातमें उस समय केवल माता पिताको प्रेम होता है, सन्तानका अधूरा प्रेम उस बातसे रहता है। जिस बातसे उस समय मातापिता दोनोंका प्रेम नहीं होता, सन्तान उसकी कट्टर विरोधी हो जाती है। जिस बातसे उस समय केवल माता या पिताको प्रेम नहीं होता, सन्तानको उसमें विशेष रुचि नहीं होती। (रतिशास्त्र)

इससे स्पष्ट है कि गर्भाधान समयमें मातापिताका प्रेम जिस बातमें जितना होता है, वृत्तके सरमें उस प्रेमका स्थान उतना ही प्रबल और निर्बल होता है। इस कारण हर मनुष्य हर बातका प्रेमी नहीं होता।

एक बात सारे मनुष्य क्या, जीवमात्रमें दिखलाई पड़ती है कि सब लोग स्त्री-जातिके प्रेमी होते हैं और स्त्री-जाति पुरुष