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संतति शास्त्र

संतति शास्त्र

Santati Shastra

पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव द्वारा

स्रोत: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (उद्गम)

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पृष्ठ 123

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सन्तति-शास्त्र ।

१. हाथसे चोट लग जाने, नखून और दाँतकी चोटसे ।
दुष्ट अर्थात् बद्बलन स्त्रियोंके संयोगसे, लिंग और
योनिकी सफाई न होने से अतिमैथुनसे उपदंश होता
है। (श० क०)

२. सुकरी इत्यादिके मूत्र और उपदंशके रोगीने जिस
स्थानपर पेशाब किया हो, वहाँ पेशाब करनेसे । (श० क०)
इन कारणोंसे पाँच प्रकारका उपदंश होता है ।

१ वातज उपदंश ।

१. इसमें योनिके मुख या ओठपर छोटे छोटे दाने हो जाते
हैं, उनमें दर्द और खुजली होती है । पानी लगनेपर
फुसियाँ फैलती जाती हैं । (श० क०)

२ पित्तज उपदंश ।

१. इसमें पीले रंगकी फुसियाँ और घाव होते हैं, मवाद
आता है और अत्यन्त दाह होता है । (श० क०)

३ रक्तज उपदंश ।

१ इसमें लाल रंगकी फुसी होती है और खुजली होती
है । (श० क०)

४. कफज उपदंश ।

१. इसमें सफेद और बड़े घाव होते हैं । पकनेमें अधिक
समय लगता है । मवाद गाढ़ा आता है । खुजली और
शोथ अधिक होता है । जख्म सफेद पीपसे भरा रहता
है । (श० क०)

५. सन्निपातिक उपदंश ।

१. इसमें वात, पित्त और कफ तीनोंका दोष मिला रहता
है । पीड़ा अधिक होती है, जल्दी आराम नहीं होता ।
अनेक प्रकारके स्नाव होते हैं । (श० क०)