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संतति शास्त्र

संतति शास्त्र

Santati Shastra

पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव द्वारा

स्रोत: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (उद्गम)

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सन्ततिशास्त्र ।

उठ जाता है। ऐसी स्त्रीके जोड़ और पेड़में शूल होने लगता है।

इन इकीस प्रकारके योनि-रोगों के उपद्रवोंसे योनि और्यको ग्रहण नहीं करती और न ऐसी स्त्रीको गर्भ ही रहता है, अनेक प्रकारके रोग, गुल्म, अर्श और प्रदर इत्यादि उत्पन्न होते हैं। इन रोगोंमें हमेशा स्त्रीको वायुका दोष होता है। इन इकीस प्रकारके योनि-रोगोंमें वातज, पित्तज कफज और त्रिदोषज इनमें मामूली दोष होता है। रक्त पित्तज और त्ररजस्का पित्तजन्य है, परिप्लुता और वामिनी वातपित्तज त्मक, कर्णिनी और उपप्लुता वात-कफज और वाकी सब वातज हैं। वातादि दोष सारे रोगोंमें अपने अपने लक्षण प्रकाश करके जोड़ों उत्पन्न करते हैं।

२. बाहरी योनिकी मामूली सूजन।

इसके कई कारण हैं।

(५७० क०)

१. वह कारण जब कि वह रोग रुदकिशोरों में हो।

१. सफाईका न होना और रोगोंकी छूत पहुँचनेसे।

२. चोट लगनेसे।

२ वह कारण जब कि वह रोग जवान स्त्रियोंमें हो।

१. अतिमैथुन और सफाईका न होना।

२. प्रदर और बाहरी चोट लगने से।

३. वदद्वार चीज या छूतदार रोगोंकी छूतसे।

इस रोगमें अनेक लक्षण प्रगट होते हैं।

१. पीड़ा—जहाँ सूजन हो।

२. कमर, पैड़ और जाँघमें दर्द।

३. पेशाब जलनेके साथ होना।

४. मैथुनमें अत्यन्त कष्ट होता है।