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सर्वकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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पृष्ठ 650

निर्वाण-प्रकरण उ० ] * श्रीवसिष्ठजीके द्वारा जल और तेजस्-तत्त्वकी धारणासे प्राप्त अनुभव * ६०५

अनुभव मानता हूँ। जलकणका' रूप धारण करके हवाके
रथपर चढ़कर मैंने आकाशकी निर्मलगलियोंमें सुगन्धकी
भाँति विचरण किया। जलकी समता प्राप्त करा देनेवाली
उस जलमयी धारणाके द्वारा अजड होकर भी जड (जल)-
सा बनकर तथा समस्त पदार्थोंके भीतर ज्ञातारूपसे
रहता हुआ भी दूसरोंके द्वारा अज्ञात होकर रहा।

रघुनन्दन ! तत्पश्चात् मैं तेजस्तत्त्वकी बढ़ी हुई धारणाके
द्वारा चन्द्रमा, सूर्य, तारा और अग्नि आदि विचित्र अवयवोंसे
युक्त तेज बन गया। तेजके सदा सत्त्व-प्रधान होनेके
कारण मैं प्रकाशरूप बनकर चमक उठा। संसारमें जितने
भी रूप हैं, वे सब प्रकाशके ही अङ्ग हैं। अतः सदा
प्रकाशकी गोदमें शयन करनेवाले शुक्ल, कृष्ण और अरुण
आदि समस्त वर्णोंका मैं स्वरूपदाता पिता हो गया।
अपने तेजःस्वरूपसे मैं दिग्वधुओंके लिये स्वच्छ दर्पण
बन गया।-रात्रिरूपी कुहरेको नष्ट करनेके लिये वायु-
स्वरूप हो गया। चन्द्रमा, सूर्य और अग्निका तो जीवन-
सर्वस्व ही था। मैं स्वर्गलोकके लिये कुंकुमका आलेप
बन गया। मैं तेज बनकर सुवर्ण आदि सुन्दर
वर्ण (रंग) बन गया, मनुष्य आदिमें पराक्रम हो
गया, रत्न आदिमें चकाचौंध पैदा करनेवाली कान्ति
बन गया और वर्षाऋतुमें विद्युत्का प्रकाश हो गया।
तेजकी धारणासे तेजोमय होकर मैं उन वृत्र आदि
असुरोंके मस्तकपर वज्रका प्रहार बन गया; जो अपने
थप्पड़से शत्रुओंका सिर फोड़ डालते थे। साथ
ही सिंह आदिके हृदयमें पराक्रम बनकर बैठ गया।
रणाङ्गणमें निर्भय विचरण करानेवाला जो उद्भट पराक्रम
वीरपुरुषोंके भीतर प्रसिद्ध है, वह भी मैं ही बन गया।
वह भी साधारण पराक्रम नहीं, अपितु जो कठोर लोह-
कवचोंको तोड़नेवाले खड्गोंके परस्पर आघातोंसे उत्पन्न
हुई टंकारध्वनिसे अत्यन्त पटु तथा महान् आडम्बरसे
युक्त हो। सूर्यरूप होकर मैंने दसों दिशाओंमें फैले
हुए किरणरूपी हाथोंसे जगतरूपी पक्षीको, जिसके बड़े-
बड़े पर्वत अङ्ग थे, पकड़ लिया। उस समय मुझको यह
सारा भूतल एक छोटेसे गाँवके समान दिखायी दिया।
चन्द्रमाके रूपमें प्रकट होनेपर मेरा आकार अमृतसे भरी
हुई झीलके समान हो गया। मैं द्युलोकरूपी सुन्दरीका
मुख बन गया। निशारूपिणी निशाचरीके हास्य-सा लगने
लगा और रात्रिमें यत्र-तत्र प्रवेश करनेवाले पुरुषोंके
लिये प्रकाश-दीपका काम देने लगा। मैंने अग्नि
बनकर दावानलकी ऐसी ज्वाला फैलायी, जिससे
लकड़ियोंका तत्काल विदारण हो जाता था और मेरी
दुर्निवार दीप्ति बढ़ जाती थी। बड़े-बड़े काष्ठोंके फूटने
और फटनेसे अत्यन्त कठोर शब्द उत्पन्न होते थे।
यज्ञाग्नि बनकर मैंने हविष्यादिका भी कल्याणकारी कार्य
सम्पन्न किया। कहीं लोहार आदिकी प्रयोगशालाओंमें
मैंने तप्त लोहपिण्ड आदिमें रहकर हथौड़े आदिसे
ताड़ित होनेपर उन ताड़नकर्ताओंको जलानेके लिये
आगकी चिनगारियाँ प्रकट की थीं।

श्रीरामजीने पूछा—मानदाता मुने ! उस अवस्थामें
आपको सुखका अनुभव हुआ या दुःखका ? यह मुझे मेरी
जानकारीके लिये बताइये।

श्रीवसिष्ठजीने कहा--रघुनन्दन ! जैसे सोया हुआ
पुरुष चेतन होता हुआ भी जडताका अनुभव करता है,
वैसे ही चेतनाकाश अपने संकल्पसे दृश्यभावको प्राप्त होकर
जडताका-सा अनुभव करता है। जब ब्रह्म अपनेको पृथ्वी
आदिके रूपमें समझता है, तब मृतकी भाँति जड-सा
बनकर स्थित रहता है। इसका जो सचिदानन्दात्मक
यथार्थ स्वभाव है, उसका कभी अन्यथाभाव नहीं होता।

(सर्ग ९०-९१)


सं० यो० व० अं० २१—