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सर्वकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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पृष्ठ 616

निर्वाण-प्रकरण उ० ] * अहंकाररूपी पिशाचकी शान्तिका उपाय * ५७१

मैं इसके किसी दूरवर्ती कोनेमें उत्तम योगयुक्तिका आश्रय लेकर स्थित रहूँगा, आकाशके एक कोनेमें संकल्पसे ही कुटी बनाकर उसके भीतर शुद्ध हो वासनारहित होकर निवास करूँगा।'

ऐसा सोचकर निर्मल आकाशमें ज्यों ही मैं आगे बढ़ा, त्यों ही देखता हूँ कि इस आकाशका भी सारा अन्तःप्रान्त विक्षेपके कारणोंसे व्याप्त है। अनेक प्रकारके भूतगण यहाँ विचर रहे हैं। तब मैं आकाशवर्ती भूतगणोंको त्यागकर वहाँसे दूरतिदूर एकान्त स्थानमें जा पहुँचा, जो अत्यन्त विस्तृत और सूना था। वहाँ बहुत धीमी-धीमी हवा चल रही थी। स्वप्नमें भी भूतगण वहाँ नहीं पहुँच सकते थे। न तो वहाँ मङ्गलसूचक शुभ शकुन होते थे और न उत्पातसूचक अपशकुन। तुम उस स्थानको संसारी पुरुषोंके लिये अलभ्य समझो। उस शून्य प्रदेशमें मैंने अपने संकल्पसे ही एक कुटीका निर्माण किया। उसका भीतरी भाग स्वच्छ एवं विशद था। उसकी दीवारोंमें कहीं छेद नहीं थे। इसलिये वह घनीभूत जान पड़ती थी तथा देखनेमें कमल-कोशके समान सुन्दर लगती थी। फिर मैंने मन-ही-मन यही मन्तव्य स्थिर किया कि यह कुटी समस्त भूतोंके लिये अगम्य हो जाय। तदनन्तर मैं उन सब भूतोंके लिये अगम्य कुटीरमें प्रविष्ट हुआ। वहाँ पद्मासन लगाकर शान्त-चित्त हो मैंने अत्यन्त मौन धारण कर लिया। साथ ही यह निश्चय किया कि मैं इसके बाद ही मैं इस समाधिसे उठूँगा। इसके बाद मैं निर्विकल्प समाधिमें स्थित हो गया। उस समय ऐसा जान पड़ता था मानो मैंने निद्राकी मुद्रा धारण कर ली हो। मेरी बुद्धिमें समता थी। मैं निर्मल आकाशके समान शुद्धभागमें अपने स्वरूपमें प्रतिष्ठित था। ऐसा लगता था मानो आकाशसे खोदकर मेरी प्रतिमा प्रकट की गयी हो। छ सौ वर्षोंका समय मेरे लिये एक पलके समान व्यतीत हो गया; क्योंकि समाधिमें चित्तको एकाग्र करनेवाले पुरुषोंके लिये बहुत समयतक रहनेवाली कालकी गतियाँ भी थोड़ी प्रतीत होती हैं। तदनन्तर काल्पनिक अहंकाररूपी पिशाच इच्छारूपिणी पत्नीके साथ वहींसे मेरे पास आ धमका। (सर्ग ५५-५६)


अहंकाररूपी पिशाचकी शान्तिका उपाय—सृष्टिके कारणका अभाव होनेसे उसकी असत्ता तथा चिन्मय ब्रह्मकी ही सृष्टिरूपताका प्रतिपादन

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—श्रीरामभद्र ! अज्ञानसे अपने अन्तःकरणमें अहंभावरूपी पिशाचकी कल्पना कर ली गयी है, जो वास्तवमें है नहीं। जैसे हाथमें दीपक लेकर ढूँढ़नेवालेको अन्धकारका स्वरूप नहीं दिखायी देता, वैसे ही विचारशील पुरुष यदि देखे तो उसे अज्ञानकी उपलब्धि नहीं हो सकती। अहंता-रूपिणी पिशाचीके स्वरूपपर विचार करते हुए जैसे-जैसे उसकी ओर देखा जाता है, वैसे-ही-वैसे वह छिपती जाती है। सृष्टिकी सत्ता होनेपर ही अविद्याका अस्तित्व सम्भव हो सकता है, और किसी हेतुसे नहीं। परंतु यह सृष्टि तो कभी उत्पन्न हुई ही नहीं। केवल अज्ञानियोंके अनुभवमें आती है। वास्तवमें वह है नहीं। जैसे आकाशमें कभी वृक्ष पैदा नहीं हुआ, उसी प्रकार सृष्टिका कोई कारण न होनेसे वह पूर्वकालमें ही उत्पन्न नहीं हुई थी। मनसहित छः इन्द्रियोंके दृश्य न होने-वाला निराकार परब्रह्म मनसहित छः इन्द्रियोंके विषय-भूत साकार जगत्‌का वस्तुतः कारण कैसे हो सकता है। कहते हैं बीजरूपी कारणसे अङ्कुररूपी कार्य उत्पन्न होता है। परंतु जहाँ बीज भी नहीं है, वहाँ अङ्कुर कैसे हो सकता है ? कारणके बिना कार्यकी उत्पत्ति कदापि सम्भव नहीं है। आकाशमें वृक्ष, जिनके होने-सा कुछ स्पष्टरूपसे देख पा रहा है।