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सर्वकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

पृष्ठ 508, कुल 750 में से

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पृष्ठ 508

[ निर्वाण-प्रकरण पू० ] * कुम्भकी बातें सुनकर सर्वत्यागके लिये उद्यत शिखिध्वज * ४६५

'अतः सर्वत्यागजन्य परमानन्दकी प्राप्तिका व्यर्थ ही अभिनय मत कीजिये। अपने सर्वोत्तम भागका तो अभी आपने त्याग किया ही नहीं, जिसके पूर्णतः त्याग करनेसे ही आपको परम अशोक-पदकी प्राप्ति हो सकेगी।

शिखिध्वज बोले—देवतात्मज ! अब तो सर्वत्यागमें मेरा यह शरीर, जो रक्त-मांसमय तथा इन्द्रियसे युक्त है, शेष रह गया है; इसलिये अब मैं पुनः उठकर बिना किसी विघ्न-बाधाके इस शरीरको गड्ढेमें गिराकर विनष्ट कर दूँगा और सर्वत्यागी हो जाऊँगा।

कुम्भने कहा—राजन् ! इस बेचारे निरपराध शरीरको आप क्यों महान् गर्तमें गिराना चाहते हैं ? आप तो उस अज्ञानी बैलके सदृश प्रतीत होते हैं, जो कुपित होनेपर अपने बछड़ेको ही मारता है। यह बेचारा शरीर तो जड़, तुच्छ और मूकात्मा है। सदा ध्यानस्थ-सा बना रहता है। इसने आपका कोई अपराध भी नहीं किया है, अतः व्यर्थ ही आप इसका त्याग मत कीजिये। जैसे वायुद्वारा

स्पन्दन (फलादिका पतन) होनेपर फलवान् वृक्षका कोई अपराध नहीं माना जाता, उसी प्रकार सुख-दुःख आदिका अनुभव-स्थान होनेमात्रसे शरीरको अपराधी नहीं कहा जा सकता। स्पन्दनशील वायु ही बलपूर्वक फल, पल्लव और पुष्पोंको गिराती है, फिर बेचारे माधुर्यस्वभाव वृक्षका क्या अपराध ? इसी प्रकार साधु शरीरने साधु आत्माका कौन-सा अपराध किया है ! कमललोचन ! साथ ही, शरीरका त्याग कर देनेपर भी आपका सर्वत्याग निष्पन्न तो होगा नहीं; फिर व्यर्थ ही आप इस निरपराध शरीरको गड्ढेमें क्यों फेंक रहे हैं ! देहका त्याग कर देनेपर सर्वत्याग सिद्ध नहीं होता। जैसे उन्मत्त गजराज वृक्षको तहस-नहस कर देता है, उसी तरह जिसके द्वारा यह शरीर क्षुब्ध हो उठता है, उस पापात्माका यदि आप पूर्णतया त्याग करते हैं तभी आप महान् त्यागी हैं। भूपते ! उस पापात्माका परित्याग कर देनेपर देहादि समस्त पदार्थोंका अपने-आप त्याग हो जाता है। यदि उसका त्याग नहीं हुआ तो गर्तमें गिरकर नष्ट हुआ भी शरीर उस पापात्मासे बार-बार उत्पन्न होता रहेगा।

शिखिध्वज बोले—सौन्दर्यशाली देव ! इस शरीरका संचालन करनेवाला वह पापात्मा कौन है ? जन्मादि कर्मोंका बीज क्या है और किसका त्याग कर देनेपर सर्वत्याग सम्पन्न होता है ?

कुम्भने कहा—साधुस्वभाव नरेश ! शरीर अथवा राज्यका त्याग कर देनेसे तृणकुटिया जलाकर भस्म कर देनेसे सर्वत्याग सम्पन्न नहीं होता, वह तो सर्वात्मक एवं सर्वव्यापी सङ्कल्पद्वारा सबके एकमात्र कारणभूत सर्व भावका परित्याग कर देनेपर ही निष्पन्न होगा।

शिखिध्वज बोले—समस्त तत्त्वज्ञानियोंमें श्रेष्ठ कुम्भ ! अच्छा, यह बतलाइये आपने जिस सर्वथा एवं सर्वदा त्यागने योग्य, सर्वगत एवं सर्वात्मक वस्तुका नाम लिया है, वह सर्वात्मा किसे कहते हैं ?

कुम्भने कहा—नरेश्वर ! आप चित्तको ही भ्रम,