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सर्वकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

पृष्ठ 352, कुल 750 में से

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पृष्ठ 352

उपशम-प्रकरण ] * सुरघुके आत्मविषयक चिन्तनका वर्णन और उसे परमपदकी प्राप्ति * ३१३

हुए जलकी बूँदकी तरह उनका मेरे साथ सम्बन्ध नहीं
है। इस प्रकार मास, रक्त और हड्डियाँ—ये सभी जड
हैं; अतः मैं ये नहीं हूँ और न किसी दशामें
ये मेरे हैं। कर्मेन्द्रियाँ भी मैं नहीं हूँ और न कर्मेन्द्रियाँ
मेरी हैं। इस प्रकार इस देहमें यावन्मात्र जड पदार्थ
हैं, वे मैं नहीं हूँ; क्योंकि मैं तो चेतन हूँ। मैं भोग
नहीं हूँ और न भोग मेरे हैं। ज्ञानेन्द्रियाँ भी मेरी नहीं
हैं और न मैं ही ज्ञानेन्द्रियाँ हूँ; क्योंकि वे जड और
असत्स्वरूपा हैं। जो संसाररूपी दोषका मूल कारण
है, वह मन भी मैं नहीं हूँ; क्योकि वह तो जड है।
बुद्धि और अहङ्कार भी मैं नहीं हूँ और न वे मेरे
हैं; क्योंकि यह दृष्टि मनोमयी होनेके कारण जड है।
यों चञ्चलत्वरूपवाले शरीरसे लेकर मन, बुद्धि और
इन्द्रिय आदितक जो स्थूल-सूक्ष्म भूतोंका समुदाय है,
उनमेंसे मैं एक भी नहीं हूँ।

'अहो ! महान् आश्चर्यकी बात है, मैं तो सम्पूर्ण
विकल्पोंसे रहित विशुद्ध साक्षीस्वरूप चेतन आत्मा हूँ।
जिसकी प्राप्तिके लिये मै चिरकालसे प्रयत्नशील था,
उस आत्माकी उपलब्धि तो मुझे आज ही हुई है ।
जिस विशुद्ध आत्माका कहीं अन्त नहीं है, वह
तत्पदबोध्य असीम आत्मा ही मैं हूँ। वह चेतन आत्मा
निर्मल, विषय-दोषोंसे शून्य, सम्पूर्ण दिङ्मण्डलको
परिपूर्ण करनेवाला, सर्वव्यापक, सूक्ष्म, उत्पत्ति-विनाश-
रहित, समस्त आकारोंसे परे एव सर्वदा सर्वभावको
प्राप्त है। जगत्की यह अनुमन्त्रात्मक कल्पना भी चेतना-
शक्तिमयी ही है। यह जो सुख और दुःखकी दशाका
ज्ञान होना है, वह तो मिथ्या अनुभवमात्र है तथा जो
नाना प्रकारके आकारोंकी प्रतीति होती है, वह सब
कुछ परम चेतन आत्मा ही है। जो समस्त जगत्में
व्यापक है, वही चेतन मेरा आत्मा है और जो मेरी
बुद्धिका साक्षी है, वही यह चेतन है। इसी चेतन-
शक्तिकी कृपासे मन देहरूपी रथपर आरूढ होकर
अनेकों सृष्टि-विलासोंमें जाता है, वहाँ दौड़-धूप करता
और नाचता है । वस्तुतः तो ये मन-शरीर आदि
वस्तुएँ कुछ भी नहीं हैं, क्योंकि इनके नष्ट हो जानेपर
भी आत्माका कुछ नहीं बिगड़ता । चित्तरूपी नटने ही
इस जगज्जालरूपी नाटकका विस्तार किया है । इसे'
केवल वही बुद्धि देखती है, जो दीप-शिखाके समान
देदीप्यमान है। अत्यन्त खेदकी बात है कि निग्रह और
अनुग्रहकी स्थितिमें मुझे देहविषयिणी चिन्ता व्यर्थ ही
हुई; क्योंकि परमार्थतः देह कुछ भी नहीं है। अहो !
अब तो मुझे विशेषरूपसे ज्ञानकी प्राप्ति हो गयी है,
जिससे मेरा असद्विचार नष्ट हो गया है। जिसे जानना
आवश्यक था, उसे मैंने जान लिया और जो प्राप्त करने
योग्य था, उसे पा लिया । अब लोकमें वे निग्रह और
अनुग्रह कहाँ हैं, किस प्रकारके हैं, किसमें रहते हैं
और उनका स्वरूप क्या है ? इसी तरह हर्ष और
अमर्षकी परम्परा भी कहाँ है ? अर्थात् ये सभी व्यर्थ
कल्पनामात्र ही हैं। अब मैं रागशून्य, विषयोंके संसर्ग-
से रहित और सुषुप्ति आदि अवस्थाओंसे परे होकर उस
विशुद्ध विज्ञानानन्दघन परमात्मामें, जो संसार-भ्रम और
रागादिसे शून्य है, नित्य निवास करूँगा।'

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुकुलभूषण राम ! जैसे
गाधिनन्दन विश्वामित्रने अपने तपोबलसे ब्राह्मणत्व प्राप्त
कर लिया था, उसी तरह हेमजट नामक किरातोंके
राजा सुरघुने निश्चयात्मक ज्ञानके बलसे परमपद प्राप्त
कर लिया । तभीसे राजा सुरघु चिन्ताओंसे मुक्त हो
गया । वह सर्वदा निग्रह-अनुग्रहरूपी अपने राजोचित
कार्योंमें उसी तरह अटल बना रहता था, जैसे जल-
प्रवाहके सम्मुख पर्वत निष्कम्प बना रहता है। हर्ष,
विषाद और ईर्ष्यासे रहित होकर प्रतिदिन यथावसर
प्राप्त हुए कार्योंको न्यायपूर्वक करता हुआ राजा सुरघु
अपनी उदार और गम्भीर आकृतिद्वारा समुद्रसे भी बढ़-
कर सुशोभित होने लगा। उसकी वृत्ति अन्त करणको