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सर्वकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

पृष्ठ 282, कुल 750 में से

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पृष्ठ 282

स्थिति-प्रकरण ] * वासना, अभिमान और एषणाका त्याग करके परमात्मपदमें प्रतिष्ठित होनेकी प्रेरणा * २४५

लिये मुक्त हो जाता है ।) अतः मन, बुद्धि आदिसे युक्त सम्पूर्ण वासनाओंका त्याग करके जिस वृत्तिके द्वारा उन सबका त्याग किया जाता है, उस बुद्धिवृत्तिका भी त्याग कर दो अर्थात् उसमें सम्बन्धरहित हो जाओ और सबका अभाव हो जानेपर जो एकमात्र नित्य सच्चिदानन्दघन परमात्मा ही शेष रहता है, उसीमें अविचलभावसे स्थित रहो । शुद्ध बुद्धिसे युक्त रघुनन्दन ! प्राणोंके स्पन्दनपूर्वक कलना (चेष्टा एवं सङ्कल्प), काल, प्रकाश एवं तिमिर आदिका तथा वासना और विषयोंका (इन्द्रियों तथा समूल अहङ्कारका) सर्वथा त्याग करके उनसे सम्बन्धरहित होकर जो तुम आकाशके समान सौम्य (निर्मल), प्रशान्त-चित्त तथा चिन्मयरूपसे विराज रहे हो, उसी सर्वसम्मानित रूपमें स्थित रहो । जो परम बुद्धिमान् पुरुष सबका हृदयसे परित्याग करके सब विक्षेपोंके कारणभूत अभिमानसे रहित हो जाता है, वह साक्षात् शुद्ध, बुद्ध, मुक्तस्वरूप परमेश्वर हैं । जिसके हृदयमें अभिमानका अत्यन्त अभाव हो गया है, ऐसा विशुद्ध अन्तःकरणवाला ज्ञानी महात्मा ध्यान, समाधि अथवा कर्म करे या न करे, सदा मुक्त ही है; क्योंकि जिसका मन सर्वथा वासनारहित हो गया है, उसे न तो कर्मोंके त्यागसे कोई प्रयोजन है और न कर्मोंके अनुष्ठानसे ही । जप, ध्यान और समाधिसे भी उसका कोई प्रयोजन नहीं है । मैंने शास्त्रका अच्छी तरह विचार किया और चिरकालतक सत्पुरुषोंके साथ परामर्श करके यही सार निकाला कि सम्पूर्ण वासनाओंसे रहित हुए सच्चिदानन्दघन परमात्माके निरन्तर मननरूप मौनसे बढ़कर दूसरा कोई उत्तम पद नहीं है । दसों दिशाओंमें घूम-घूमकर मैंने सारी दर्शनीय वस्तुओंको देख लिया; उनमें कुछ ही लोग ऐसे दिखायी दिये, जो परमात्माके स्वरूपका यथार्थ अनुभव करनेवाले हैं ।

मनुष्यके जो कोई भी लौकिक शुभ आयोजन हैं और जो भी उनके व्यावहारिक सत्कर्म हैं, वे सब केवल शरीरका निर्वाह करनेके लिये ही हैं, आत्माके लिये नहीं । पाताल, भूतल, स्वर्गलोक, ब्रह्मलोक और आकाशमें कुछ ही ऐसे प्राणी दृष्टिगोचर होते हैं, जिन्हें सच्चिदानन्द परमात्माका यथार्थ बोध हो गया हो । जिस ज्ञानीके 'यह ग्राह्य है, यह त्याज्य है' इस तरहसे अज्ञानजनित निश्चय नष्ट हो गये हैं, ऐसा कर्तव्याकर्तव्य-दृष्टिसे रहित ज्ञानी महात्मा अत्यन्त दुर्लभ हैं । प्राणी चाहे लोकमें राज्य करे, चाहे मेघ या जलमें प्रवेश कर जाय; परंतु परमात्माकी प्राप्तिके बिना उसे परम शान्ति नहीं मिल सकती । जो इन्द्रियरूपी शत्रुओंका दमन करनेमें शूरवीर हैं, जन्मरूपी ज्वरका विनाश करनेके लिये उन्हीं महाबुद्धिमान् महापुरुषोंकी सेवा करनी चाहिये । पातालमें और स्वर्गमें सर्वत्र पाँच ही भूत हैं, छठा कुछ भी नहीं है । फिर धीर मनुष्योंकी बुद्धि कहाँ अनुरक्त हो (क्योंकि सर्वत्र क्षणभङ्गुर पदार्थोंकी ही उपलब्धि होती है) । शास्त्रके अनुसार निष्कामभाव-रूप युक्तिसे व्यवहार करनेवाले विवेकी पुरुषके लिये संसार गौके खुरके समान अनायास ही लाँघ जाने योग्य है । परंतु जिसने उपर्युक्त युक्तिका दूरसे ही परित्याग कर दिया है, उस अज्ञानीके लिये यह संसार महाप्रलयकालीन महासागरके समान दुस्तर है । पातालसे लेकर स्वर्गपर्यन्त इस जगत्में ज्ञानी महात्मा पुरुषके लिये कोई भी कर्तव्य नहीं है । जैसे मन्द-मन्द वायुके चलनेसे पर्वत नहीं हिलता, वैसे ही भोग-समूहोंसे तत्त्वज्ञानी पुरुष नहीं विचलित होता । जैसे बादल आकाशमें बारंबार छा जानेपर भी उसे अपने रंगमें नहीं रँग सकते, उसी प्रकार संसारके ये विषय-भोगरूप कोई भी पदार्थ पुनः-पुनः प्राप्त होनेपर भी विशाल-हृदय तत्त्वज्ञानी महात्मा पुरुषको आसक्त नहीं कर सकते । (सर्ग ५७)