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सर्वकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

पृष्ठ 192, कुल 750 में से

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उत्पत्ति-प्रकरण] * राजा विदूरथका सेनाके साथ युद्धके लिये प्रयाण, युद्धारम्भ तथा विदूरथकी पराजय * १५७

तथा अपने करोड़ों चोंचोंसे पर्वतोंके शिखरोंको काट-काट-
कर उसी प्रकार भूतलपर गिरा देते थे, जैसे प्रचण्ड वायु
फलोंको गिराकर पृथ्वीपर बिछा देती है । तब विदूरथने
वज्रास्त्रको शान्त करनेके लिये ब्रह्मास्त्रका प्रयोग किया । फिर
तो ब्रह्मास्त्र और वज्रास्त्र दोनों एक साथ ही शान्त हो गये।

इस प्रकार जब वह भयकर संग्राम चल ही रहा था,
उसी समय प्रतिभाशालीयोंमें सर्वश्रेष्ठ, महान् उदार एवं
उत्कृष्ट धैर्यशाली राजा सिन्धुने विपक्षियोंकी सारी सेनाका
विनाश और अपनी सेनाकी पीड़ा-शान्तिके लिये एकमात्र
वैष्णवास्त्रका स्मरण किया, जो दिव्यास्त्रोंका राजा, परम
ऐश्वर्यशाली एवं कालरुद्रके समान संहारकारी था । उस
वैष्णवास्त्रसे अभिमन्त्रित करके राजा सिन्धुने जो बाण
चलाया, उसके फलके अग्रभागसे उल्मुक आदि निकलने
लगे । उससे निकली हुई प्रकाशमान चक्रोंकी पङ्क्तियोंने
दिशाओंको सैकड़ों सूर्योंसे युक्त-सा बना दिया । पङ्किरूपमें
सम्मुख दौड़ती हुई गदाएँ आकाशमें सैकड़ों बाँसोंकी
भाँति प्रतीत होती थीं । सौ धारवाले वज्रसमूहोंने आकाशको
तृणराशिसे आच्छादित-सा कर दिया। पद्माकार पट्टिशोंकी
कतारें आकाशमें कटे हुए वृक्षों-सी दीख रही थीं । तीक्ष्ण-
धारवाले बाणोंकी पङ्क्तियाँ ऐसी जान पड़ती थीं, जैसे
आकाशमें पुष्पजाल बिछा हो। काली आकृतिवाले खड्गोंकी
कतारें नभोमण्डलको पत्र-समूहोंसे व्याप्त-सा कर रही थीं ।
तब विपक्षी राजा विदूरथने भी उस वैष्णवास्त्रकी शान्तिके
लिये वैष्णवास्त्रका ही प्रयोग किया, जो शत्रुके पराक्रमके
अनुरूप ही था। उससे भी बाण, शक्ति, गदा, प्रास,
पट्टिश आदि आयुधरूपी जलसे परिपूर्ण बहुत-सी शस्त्रास्त्रोंकी
सरिताएँ प्रकट हुईं, जिन्होंने पूर्वप्रयुक्त वैष्णवास्त्रसे उद्भूत
हथियारोंको नष्ट कर दिया । उन शस्त्रास्त्रपूर्ण नदियोंका
आकाशमें ही ऐसा भीषण युद्ध प्रारम्भ हुआ, जो द्युलोक
और पृथ्वीके अवकाशका विनाश करनेवाला तथा बड़े-बड़े
कुलपर्वतोंको विदीर्ण कर देनेवाला था । जैसे मेरे आयुधोंने
विश्वामित्रके अस्त्रोंका निवारण किया था, उसी तरह परस्पर
जूझते हुए उन दोनों वैष्णवास्त्रोंकी धारावाहिक बाण-वृष्टिने
शस्त्र-समूहोंको काट डाला और उन अस्त्रोंसे प्रकट हुए
वज्रोंने अकाट्य पर्वतोंको भी जर्जर कर दिया । इस प्रकार
दोनों राजाओंके वे अस्त्र पराक्रमशाली दो सुभटोंकी भाँति
क्षणभरतक परस्पर अत्यन्त भयंकर युद्ध करके
शान्त हो गये ।

तत्पश्चात् राजा सिन्धु अपने रथको छोड़कर पृथ्वीपर
उतर पड़ा और ढाल-तलवारसे लैस हो गया । फिर तो
उसने पलक मारते-मारते बड़ी फुर्तीसे अपने शत्रु राजा
विदूरथके रथके घोड़ोंके खुरोंको मृणालकी भाँति तलवारसे
काट गिराया । अब तो राजा विदूरथ भी रथहीन हो गये,
अतः उन्होंने भी ढाल-तलवार उठा ली । उस समय उन
दोनोंके आयुध एक-से थे और दोनोंका उत्साह भी समान
था; अतः वे परस्पर वार करनेके लिये पैंतरे बदलने लगे।
परस्पर प्रहार करते हुए उन दोनोंके खड्ग आरेके समान
हो गये थे । इसी बीच राजा विदूरथने खड्ग छोड़कर एक
शक्ति हाथमें ली और उसे शत्रुपर चला दिया । वह शक्ति
मथे जाते हुए समुद्रके जलकी तरह घर्घर्शब्दसे युक्त
अतएव महान् उत्पातकी सूचना देनेवाले वज्रके सदृश थी ।
वह अविच्छिन्नरूपसे आयी और राजा सिन्धुके वक्षःस्थलपर
गिरी; परंतु उस शक्तिके आघातसे राजा सिन्धुकी मृत्यु
नहीं हुई ।

तब उस देशकी लीलाने पूर्वलीलासे कहा—'देवि !
बड़े कष्टकी बात है, क्योंकि जैसे देवराज इन्द्र शत्रु का
विनाश करनेके लिये वज्रका सहारा लेते हैं, उसी तरह
यह राजा सिन्धु प्रहार करनेके लिये मुसलास्त्रकी ओर
देख रहा है; परंतु मेरे पतिदेव मुसलधारी राजा सिन्धुको
चकमा देकर बड़ी फुर्तीसे सकुशल दूसरे रथपर चढ़ गये
और वेगपूर्वक दूर हट गये हैं । फिर भी हाय ! धिक्कार
है, महान् कष्ट आ पड़ा। इस राजा सिन्धुने अत्यन्त वेगसे
बाण बरसाकर मेरे स्वामीके रथको तहस-नहस करके उन्हें
भी व्यथित कर दिया और अब यह अपने वज्र-सरीखे