सांख्य दर्शन (सांख्य-प्रवचन सूत्र व हिन्दी व्याख्या सहित)
Sankhya Darshana with Hindi Commentary
महर्षि कपिल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
तीनों दर्शनोंके तात्पर्यका उद्घाटन । ( ६१ )
है कि-पहिले के समान आत्मा के अन्तर्गत रह कर भी मन
उससे उदासीन होजाता है, पहिले उस महान् आत्माके किसी
एक स्थान में सुख दुःखोंका कांटा या मच्छर सा लड़ता रहता
था, किन्तु अब वह लड़ना बन्ध होगया मुक्तावस्था से पहिले
भी सूक्ष्म शरीर के मच्छर से अन्य स्थल में ज्ज्ञान शून्य होने
के कारण आत्मा मुक्त के अविशेष ही था, अब केवल उसके
महत् स्वरूप में मच्छर का खटका ही कम हुआ है, आत्मा
में कुछ चेतनपना है, तो यही है कि मुक्तावस्था से पहिले
संसार दशा में मनके सम्बन्धसे उसे एक परमाणु देशमें ज्ज्ञान
होता है, ऐसी चेतनता उसके मनोरूप छोटे से घर के भीतर
ही रहती है, उस के बाहर आकाश से विशिष्ट उस में कोई
अधिक महत्वकी बात नहीं है, जिस प्रकार कोई मनुष्य पुष्पों
की गठरी को शिर पर रखकर जहां ले जाता है वहीं गठरी के
भीतर रहते हुये पुष्प चले जाते हैं, उसी प्रकार मन या लिङ्ग
जहां चलता रहता है, उसी के अन्तर्देश में बुद्धि, सुख, दुःख
आदि धर्म भी रहते हुए खिसकते रहते हैं, जैसे २ शरीर गति
के अनुसार एक देश से दूसरे देश में जाता है, वैसेही वैसे आ-
काश के समान पिछला २ आत्मा का भाग पीछे रहता जाता
है, और आगे २ का आत्मभाग शरीर में आता जाता है,
जिस प्रकार शरीर में सदा ही पूर्व २ का वायु निकलता रहता
है, और नवीन २ भरता रहता है, वही व्यवस्था शरीर की
गति के साथ शरीर में आत्म-भाग के सम्बन्ध की है ।
मोक्षावस्था में जब तत्व-ज्ज्ञान होता है, जिस से कि-
उससे उस मनोरूप मच्छर का सम्बन्ध टूटेगा उसी आत्मदेश
में तत्वज्ज्ञान नहीं होता जिसमें कि-पहिले अज्ञान था,
अर्थात् शरीर में निरन्तर आत्मदेशके परिवर्त्तन की धारा उस
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की गतिके अनुसार अविच्छिन्न ही रहती है, जिस आत्मदेश
को "मैं शरीरी हूं" "मैं सुखी हूं" "मैं दुःखी हूं" ऐसा
ज्ञान होता है, उसी में "मैं अशरीरी हूं" "मैं सुख दुःख
रहित तथा विभू हूं" ऐसा ज्ञान नहीं होता, सर्वथा अन्य
आत्मदेशमें अज्ञान और अन्यही आत्मदेशमें ज्ञान उत्पन्न
होता, अन्य ही देश बद्ध और अन्य ही मुक्त होता है ।
सम्पूर्ण आत्मा में बंधन तथा मोक्षका प्रभाव नहीं पड़ता ।
क्योंकि मनोदेश के अतिरिक्त देशमें आत्मा को न ज्ञान होता
है, और न सुख दुःख आदि की प्रतीति होती है, इसी से वह
अन्य देश में मुक्त ही रहता है ।
सब शरीरों में सभी आत्मा रहते हैं, तथा उनके वहां
रहने में किसी की अपेक्षा किसीमें विशेष नहीं है, देवदत्त के
शरीर में जिस प्रकार देवदत्त का आत्मा रहता है उसी प्रकार
अन्य सम्पूर्ण आत्मा रहते हैं, किन्तु देवदत्त के मन के संयोग
से देवदत्त के आत्माको ही ज्ञान होता है, अन्य सब आत्मा
जो वहां उसके समान ही रहते हैं, उन्हें किसी प्रकारका बोध
नहीं होता, जैसे आकाश कदाचित् संख्या से अनन्त हों, और
वे सब मिल कर एक हो सकते हैं, इसी प्रकार सब आत्माभी
मिल कर एकीभाव से रहते हैं, उनके विभाग का करने वाला
कोई अन्य पदार्थ इन शास्त्रों में कल्पित नहीं है कि-जिसके
मध्य में पड़ने से सब आत्मा परस्पर भिन्न रहें । विभु;आत्मा
के भेद के स्वीकार करने में इन्हें यही आवश्यकता थी कि
यदि एक ही आत्मा रहा तो एक के मुक्त होने पर सब जीव
मुक्त होजांयगे, अर्थात्-संसार में कोई न कोई मुक्त होते ही
सब संसार ही लय हो जायगा, सब संसार का एक दम नष्ट
तीनों दर्शनोंके तात्पर्यका उद्घाटन । (६३)
होना तथा कभी कोई एक आत्मा मुक्त न हो ये दोनोंही बातें
इनको स्वीकृत नहीं हैं ।
दूसरी बात यह है कि-एकही आत्मा रहे तो सभी
जीवोंको एक के सुखी या दुःखी होनेपर सुखी या दुःखी होना
पड़ेगा, किन्तु ऐसा नहीं होता है, इस लिए नाना आत्मा
मानना आवश्यक है ।
आत्माको विभु या व्यापक इसलिए मानते हैं कि-यदि
विभु न हो, किन्तु परमाणु रूप ही हो तो शरीरके सर्व देशोंमें
कण्टकादि वेधसे दुःख और अनुकूल द्रव्यके संयोग से सुखकी
प्रतीति होती है, यह दोनों बातें न होंगी, किन्तु नाना आ-
त्मा जब विभु हैं तो वे तत्वतः अलग २ किस रीति पर सिद्ध
होंगे या ख्यालमें आवेंगे, इस बातकी अधिक चिन्ता नहीं की ।
व्यापक आत्माके जन्म, मरण बन्ध, मोक्ष तथा स्वर्ग,
नरकआदि लोकोंमें गमन की व्यवस्था कर ली है, जैसेकि-पहिले
दिखाई जाचुकी है ।
शरीरके बराबर विभुत्व (व्यापकत्व) मानने में शरीर
की वृद्धि व ह्रासके साथ आत्माकी भी वृद्धि तथा ह्रास मानना
होगा, जिससे आत्माकी अनित्यता आती है, इसलिए पूर्ण
रूपसे आकाशके समान आत्माको विभु मानने को ये बाध्य
होते हैं ।
शुभ, अशुभ कर्मों से उत्पन्न होने वाले धर्म-अधर्म, जिन
से आत्माओंको स्वर्ग और नरक आदि का भोग होता है, वे
सब नित्य सम्बंध से आत्मा में ही रहते हैं ।
जिस आत्माके शरीर द्वारा कर्मों का अनुष्ठान होता है,
उनसे होनेवाला अदृष्ट (धर्म-अधर्म) उसी आत्मामें रहता है,
और उस का परिपाक होने पर उसी आत्मा को उसके फलो-
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कीय ( जो उस लोकमें उत्पन्न हुआ है-) शरीर के द्वारा उस
के स्वर्ग नरक आदि रूप फलोंका उपभोग होता है ।
सब आत्माओंके समान देश होने परभी लिङ्ग या स्थूल
शरीर किसी एकही आत्मासे सम्बन्ध किस प्रकार करता है ?
और किस रीति पर भिन्न २ शरीर पृथक् २ आत्माओंको
कृतकर्म या कर्म सम्बंधी बना देते हैं ? तथा किस चाल पर
अलग २ आत्मा, फलों का उपभोग कर लेते हैं ? इन विचित्र
प्रश्नोंका उत्तर यही देते हैं कि-पृथक् २ मनों या लिङ्ग शरी-
रोंका सम्बन्ध, पृथक् आत्माओंके साथ अनादि कालसे चला
आता है,एक मन या लिङ्ग शरीरका सभी आत्माओंसे समान
रूप से संयोग होने परभी अपने आत्मा से उसका विलक्षण
सम्बंध है, उसी के कारण उसके द्वारा अपने ही नियत आत्म-
मा को फलोपभोग करता है,अन्य आत्माभी उसी प्रकार से
भिन्न २ देशीय अपने २ लिङ्ग शरीरोंके द्वारा उपभोग करते हैं
मोक्षके पश्चात् लिङ्ग शरीरका नाश होजाता है, उसकी
स्थिति का काल आत्माको संसारके सम्बन्धके आरम्भसे मोक्ष
होने तक ही है, नैयायिक तथा वैशेषिक दर्शनके मतमें मन
नित्य है, और सब इन्द्रिय अनित्य हैं, इस कारण मोक्षके
अनन्तर मन निष्फलही उड़ता फिरता है, और अमुक्त आत्मा
बहुत हैं, किन्तु उनके प्रति नियत मन पृथक् २ हैं, इसलिए
उनके साथ उस अनाथ मनका उपयोग नहीं ।
उसका नाश इसलिए नहीं मानते कि-उनके मतमें पर-
माणु रूप सब द्रव्य नित्य हैं उनका नाश नहीं होता है । यही
सिद्धान्त मनके नाश माननेमें गले पड़कर उन्हें उसके नाश
मानने से हटा देता है ।
सांख्यने न्याय वैशेषिक के समान आत्मामें ऽज्ञान, इच्छा,
तीनों दर्शनोंके तात्पर्यका उद्घाटन । ( ६५ )
प्रयत्न, सुख, दुःख, द्वेष, तथा धर्म अधर्म साक्षात् सम्बन्ध से
स्वीकार न कर उसको शुद्ध स्फटिक पाषाण के समान स्वच्छ
या निर्गुण माना है, उस में ज्ञानादि गुणों का सम्बन्ध
ऐसा स्वीकार किया है, जैसा कि-लाल पुष्प पर काच या स्फ-
टिक धरनेसे उसमें साक्षात् जैसा लाल रङ्ग प्रतीत होने लगता
है, किन्तु वास्तविक नहीं, परमार्थतः- उनके मतमें अन्तःकरण
में ही उक्त सब गुण रहते हैं, उससे वह अन्य दोनों दर्शनों में
जो कई एक झंझट उपस्थित हो जाते हैं, उनसे बच जाता है
उनके मत में आत्मा में ज्ञानादि गुण मनके साथ इस प्रकार
चलते रहते हैं, जैसे-किसी सूत्र में कोई जलका बिन्दु हो, और
उस पर उसी सूत्र में मणिक या गोली पोई (प्रोत) हुई हो,
जिसके चलाने से सूत्र के भीतर रह करभी वह जलविन्दु गोली
के साथ सरकता रहे, किन्तु पीछे या अन्यत्र नहीं रहता, इस
चाल पर वह विन्दु सूत्र और गोली दोनों के ही भीतर रहा
हुआ प्रतीत होता है। क्योंकि-गोली के भीतर सूत्र और सूत्र
में विन्दु है। परन्तु सांख्यवालों ने समझा कि-“जब गोली के
भी भीतर है, और उसके गमनके साथ ही वह चलता है तथा
उससे अतिरिक्त वह कहीं मिलता भी नहीं” तो उसको उस
सूत्र का धर्म न मानकर उस गोली का ही धर्म क्यों न माना
जावे? तथा जिस आत्म देश में पहिले किसी वस्तुका अनुभव
उत्पन्न होकर उससे उत्पन्न हुए भावना संस्कार के द्वारा जो
फिर उसी वस्तुका स्मरण होता है, वह आत्मा के देशान्तर में
ही होता है, जहां स्मरण काल में उसका लिङ्ग शरीर रहे, उसी
प्रकार लिङ्ग शरीर के देशमें आत्मा ज्ञानवान् है और अन्य
देश में ज्ञान शून्य, यह द्विविध भाव भी सांख्योंको मानना
( ६६ ) तीनों दर्शनोंके तात्पर्यका उद्घाटन
न होगा, क्यों कि-यह एकान्त रूपसे ज्ञानादि गुणोंको अन्तः-
करण सम्बन्धी मान कर आत्मा को निर्गुणमात्र कहते हैं, सब
देश में आत्मा एकसा होने से द्वैविध्य नहीं आता है।
(विद्यामार्तण्ड )
सीताराम शर्मा शास्त्री ।
यह निबन्ध "सारस्वत" अलीगढ़ के भाग ५ अङ्क २-३
में प्रकाशित हो चुका है।
The University Library,
ALLAHABAD
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Accession No. 57148
Section No. 120 / 5
(Form No. 30.)