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सर्वकोश
सांख्य दर्शन (सांख्य-प्रवचन सूत्र व हिन्दी व्याख्या सहित)

सांख्य दर्शन (सांख्य-प्रवचन सूत्र व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sankhya Darshana with Hindi Commentary

महर्षि कपिल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished81 पृष्ठ

पृष्ठ 17, कुल 81 में से

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पृष्ठ 17

हिन्दी सांख्य दर्शन ( २ )
मान है। क्योंकि-वह अविशुद्धि, क्षय और अतिशय दोषों से
युक्त है।
(ख) श्रेयान् या दुःखध्वंसरूप मोक्ष या वास्तविक क-
ल्‍याण उससे (अविशुद्धि आदि दोष वाले से) विपरीत है।
अर्थात् अविशुद्धि आदि दोष से रहित है, सुतराम् वह दोष
युक्त उपाय का साध्य नहीं, तथा व्यक्त अव्यक्त और ज्ञ (पुरु-
ष) के विज्ञान से होता है ॥ २ ॥
शास्त्र का संक्षिप्त अर्थ ।
मूलप्रकृतिरविकृतिर्महदाद्याः प्रकृतिविकृतयःसप्त ।
षोडशकस्तु विकारो न प्रकृतिर्नविकृतिःपुरुषः ॥३॥
(क) मूलप्रकृति (प्रधान) अविकृति (अकार्य) है।
(ख) महत् आदि ७ पदार्थ (महत्तत्व, अहंकार, शब्द
स्पर्श, रूप, रस, गन्ध) प्रकृति विकृति या कार्य कारण
रूप हैं।
(ग) सोलह (१६) पदार्थ (५ ज्ञानेन्द्रियें, ५ कर्मे-
न्द्रियें १ मन, ५ महाभूत आकाश आदि) विकाररूप हैं।
(घ) पुरुष न प्रकृति (कारण) है, और न विकृति
कार्य है ॥ ३ ॥
प्रमाण और उसके भेद
(क) प्रमा का साधन प्रमाण होता है। अर्थात्-जिस वस्तु
की सहायता से पुरुष को यथार्थ ज्ञान होता है, वह वस्तु
प्रमाण कहलाती है।
दृष्टमनुमानमाप्तवचनंच, सर्वप्रमाणसिद्धत्वात् ।
त्रिविधं प्रमाणमिष्टं, प्रमेयसिद्धिः प्रमाणाद्धि ॥४॥