सम्पूर्ण चाणक्य नीति एवं राजनीति सूत्र
Sampurna Chanakya Niti & Rajaniti Sutras
आचार्य चाणक्य (विष्णुगुप्त / कौटिल्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंइन चार गुणों द्वारा उनकी दिव्यता का पता चलता
है। अपने गुणों से वे पृथ्वी पर स्वर्ग के सभी सुखों का अहसास
करा देते हैं।
अत्यन्तकोपः कटुका च वाणी, दरिद्रता च स्वजनेषु वैरम्।
नीचप्रसंगः कुलहीनसेवा, चिह्नानि देहे नरकास्थितानाम्॥
अत्यन्त क्रोध करना, कड़वी वाणी बोलना, दरिद्रता और अपने
सगे-सम्बन्धियों से वैर-विरोध करना, नीच पुरुषों का संग
करना, छोटे कुल के व्यक्ति की नौकरी अथवा सेवा करना—ये
छः दुर्गुण ऐसे हैं जिनसे युक्त मनुष्य को पृथ्वीलोक में ही नरक
के दुःखों का आभास हो जाता है॥17॥
इस श्लोक का अर्थ यह है कि क्रोध, कड़वी बात, द्वेष,
कुसंग, दरिद्रता और नीच व्यक्ति की सेवा दुष्ट लोगों के लक्षण
हैं। इन दुर्गुणों के कारण वे यहीं पर नरक के समान यातना भोगते
रहते हैं।
गम्यते यदि मृगेन्द्र-मंदिरं, लभ्यते करिकपोल मौक्तिकम्।
जम्बुकाऽऽलयगते च प्राप्यते, वत्स-पुच्छ-खर-चर्म खंडनम्॥
मनुष्य यदि सिंह की मांद के निकट जाता है तो गजमोती पाता
है और सियार की मांद के पास से तो बछड़े की पूंछ और गधे के
चमड़े का टुकड़ा ही पाता है॥18॥
भाव यह है कि बड़े लोगों के पास जाने से धन-सम्पत्ति और
ऐश्वर्य प्राप्त होता है और छोटे तथा नीच लोगों की संगति करने
से सिवाय दुःख के और कुछ भी प्राप्त नहीं होता।
शुनः पुच्छमिव व्यर्थं जीवितं विद्यया विना।
न गुह्यगोपने शक्तं न च दंशनिवारणे॥
जिस प्रकार कुत्ते की पूंछ गुप्त स्थानों को ढांप सकने में
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