सम्पूर्ण चाणक्य नीति एवं राजनीति सूत्र
Sampurna Chanakya Niti & Rajaniti Sutras
आचार्य चाणक्य (विष्णुगुप्त / कौटिल्य) द्वारा
पृष्ठ 80, कुल 196 में से
संदर्भ में पढ़ेंशान्ति कहां? दुष्ट स्त्रियों से घर में सुख कहां? दुष्ट
विद्यार्थियों को पढ़ाने से यश कहां? अर्थात् ये सभी दुःख देने
वाले हैं। इनसे सदैव अपना बचाव करना चाहिए।।14।।
प्रस्तुत श्लोक में चाणक्य ने इससे पूर्व के श्लोक जैसी बात
कही है। इस श्लोक में उन्होंने राजा, मित्र, स्त्री और शिष्य की
परिभाषा को और भी स्पष्ट कर दिया है। उन्होंने बताया है कि
दुष्ट राजा के राज्य में नहीं रहना चाहिए क्योंकि उसके राज्य में
प्रजा को सुख प्राप्त नहीं हो सकते। अपने दुष्ट आचरण से वह
प्रजा के सामने कोई-न-कोई विपत्तियां ही खड़ा करता रहेगा।
इसी तरह दुष्ट मित्र के साथ की गई मित्रता कभी किसी का
कल्याण नहीं कर सकती, दुराचारिणी स्त्री को पत्नी बनाने से
गृहस्थ का आनंद जाता रहता है। दुष्ट व्यक्ति को विद्या दान देकर
यश की आशा करना व्यर्थ है।
सिंहादेकं बकादेकं शिक्षेच्चत्वारि कुक्कुटात्।
वायसात्पंच शिक्षेच्च षट्-शुनस्त्रीणि गर्दभात्॥
सिंह (शेर) और बगुले से एक-एक, गधे से तीन, मुर्गे से चार,
कौए से पांच और कुत्ते से छः गुण (मनुष्य को) सीखने
चाहिए।।15।।
इस श्लोक का मूल भाव यह है कि मनुष्य को जो अच्छी
बात, जो सद्गुण जहां से भी मिलें, वे ग्रहण कर लेने चाहिए।
इनका उल्लेख आगे के पांच श्लोकों में किया गया है।
प्रभूतं कार्यमल्पं वा यन्नरः कर्तुमिच्छति।
सर्वारम्भेण तत्कार्यं सिंहादेकं प्रचक्षते॥
काम छोटा हो या बड़ा, उसे एक बार हाथ में लेने के बाद
छोड़ना नहीं चाहिए। उसे पूरी लगन और सामर्थ्य के साथ करना
चाहिए। जैसे सिंह पकड़े हुए शिकार को कदापि नहीं
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