सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
सम्पूर्ण चाणक्य नीति एवं राजनीति सूत्र

सम्पूर्ण चाणक्य नीति एवं राजनीति सूत्र

Sampurna Chanakya Niti & Rajaniti Sutras

आचार्य चाणक्य (विष्णुगुप्त / कौटिल्य) द्वारा

DevanagariHindipublished196 पृष्ठ

पृष्ठ 77, कुल 196 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 77

का संहार भी काल ही करता है। संसार में प्रलय
हो जाने पर वह सुप्तावस्था अर्थात स्वप्नवत रहता है।
काल की सीमा को निश्चय ही कोई भी लांघ नहीं
सकता॥7॥
काल की गति को कोई रोक नहीं सकता। समय चक्र में
आकर सभी को एक-न-एक दिन नष्ट होना पड़ता है।
काल की गति जीवन से मृत्यु तक शाश्वत है, सनातन है।
इससे बचना असंभव है। यह किसी को नहीं छोड़ता।
न पश्यति च जन्मान्धः कामान्धो नैव पश्यति।
न पश्यति मदोन्मत्तोः ह्यर्थी दोषान् न पश्यति॥
जन्म से अंधे को कुछ दिखाई नहीं देता, काम में आसक्त
व्यक्ति को भला-बुरा कुछ सुझाई नहीं देता, मद से मतवाला बना
प्राणी कुछ सोच नहीं पाता और अपनी जरूरत को सिद्ध करने
वाला दोष नहीं देखा करता॥8॥
धन और शक्ति के अहंकार से भरा व्यक्ति अपना विवेक खो
बैठता है। उसे केवल अपना स्वार्थ ही सर्वोपरि दिखाई देता है।
उसकी दशा उस अंधे के समान होती है, जो जन्म से अंधा होता
है।
स्वयं कर्म करोत्यात्मा स्वयं तत्फलमश्नुते।
स्वयं भ्रमति संसारे स्वयं तस्माद् द्विमुच्यते॥
जीव स्वयं ही (नाना प्रकार के अच्छे-बुरे) कर्म करता
है, उसका फल भी स्वयं ही भोगता है। वह स्वयं ही संसार
की मोह-माया में फंसता है और स्वयं ही इसे त्यागता
है॥9॥
वस्तुतः मनुष्य के हाथों में कुछ नहीं है। ईश्वर की प्रेरणा से
वह संसार में रहते हुए नाना प्रकार के कर्मों में फंसता है
75