सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
सम्पूर्ण चाणक्य नीति एवं राजनीति सूत्र

सम्पूर्ण चाणक्य नीति एवं राजनीति सूत्र

Sampurna Chanakya Niti & Rajaniti Sutras

आचार्य चाणक्य (विष्णुगुप्त / कौटिल्य) द्वारा

DevanagariHindipublished196 पृष्ठ

पृष्ठ 72, कुल 196 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 72

अधना धनमिच्छन्ति वाचं चैव चतुष्पदाः।
मानवाः स्वर्गमिच्छन्ति मोक्षमिच्छन्ति देवताः॥
निर्धन धन चाहते हैं, पशु वाणी चाहते हैं। मनुष्य स्वर्ग की
इच्छा करते हैं और देवगण मोक्ष चाहते हैं॥18॥
संसार में सभी प्राणी किसी-न-किसी अभाव से ग्रस्त रहते हैं।
इस अभाव को मिटाने के लिए वे प्रयत्न करते हैं।
प्रायः जिस प्राणी के पास जिस वस्तु का अभाव होता है, वह
उसी को पाना चाहता है।
सत्येन धार्यते पृथिवी सत्येन तपते रविः।
सत्येन वाति वायुश्च सर्वं सत्ये प्रतिष्ठितम्॥
सत्य पर पृथ्‍वी टिकी है, सत्य से सूर्य तपता है, सत्य से वायु
बहती है, संसार के सभी पदार्थ सत्य में निहित हैं॥19॥
यहां सत्य की महत्ता का प्रतिपादन करते हुए आचार्य
चाणक्य कहते हैं कि यह समस्त पृथ्‍वी, हवा की गति, सूर्य की
तपिश और संपूर्ण ब्रह्मांड सत्य में ही समाया हुआ है। सत्य के
द्वारा ही सारा ब्रह्मांड चलाया जाता है और कहा भी गया है
'सत्यं शिवं सुन्दरम्।' अर्थात सत्य ही सबसे बड़ा धर्म है, सत्य
से बढ़कर कुछ भी नहीं है।
चला लक्ष्मीश्चलाः प्राणाश्चलं जीवित-यौवनं।
चलाचले च संसारे धर्म एको हि निश्चलः॥
लक्ष्मी अनित्य और अस्थिर है, प्राण भी अनित्य है और जीवन
भी अनित्य है। इस चलते-फिरते संसार में केवल धर्म ही स्थिर
है॥20॥
इस संसार में केवल धर्म ही ऐसा है जो स्थिर रूप से मानव
हृदय में रहता है। इसके अलावा समृद्धि (धन-सम्पत्ति),
70