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सम्पूर्ण चाणक्य नीति एवं राजनीति सूत्र

सम्पूर्ण चाणक्य नीति एवं राजनीति सूत्र

Sampurna Chanakya Niti & Rajaniti Sutras

आचार्य चाणक्य (विष्णुगुप्त / कौटिल्य) द्वारा

DevanagariHindipublished196 पृष्ठ

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के हृदय में संवेदनशीलता की शून्यता बनी रहती है।
वह किसी के सुख-दुःख में हिस्सा नहीं लेता।
गरीबी के कारण निर्धन का कोई मित्र नहीं होता। यही कारण
है कि उसे सारा संसार और अपना जीवन व्यर्थ दिखाई देने
लगता है। तात्पर्य यह है कि जिसके पास धन नहीं है, उसके
लिए दुनिया का प्रत्येक कोना सूना है।
अनभ्यासे विषं शास्त्रमजीर्णे भोजनं विषम्।
दरिद्रस्य विषं गोष्ठी वृद्धस्य तरुणी विषम्॥
बार-बार अभ्यास न करने से विद्या विष बन जाती है। बिना
पचा भोजन विष बन जाता है, दरिद्र के लिए स्वजनों की सभा
या साथ और वृद्धों के लिए युवा स्त्री विष के समान होती
है॥15॥
अभ्यास से ही शिक्षा (विद्या) का विकास होता है। जो भोजन
पचता नहीं, वह शरीर पर कुप्रभाव डालता है। एक दरिद्र परिजन
अपने ही लोगों को विष के समान दिखलाई पड़ने लगता है। उन्हें
वह भार स्वरूप दिखाई देने लगता है। यदि किसी वृद्ध को युवा
स्त्री मिल जाए तो वह उसे संतुष्ट न करने की स्थिति में जहर
दिखाई देने लगती है। प्रत्येक वस्तु का अपना उचित स्थान और
महत्त्व होता है।
त्यजेद्धर्म दयाहीनं विद्याहीनं गुरुं त्यजेत्।
त्यजेत्क्रोधमुखीं भार्यां निःस्नेहान् बान्धवांस्त्यजेत्॥
दयाहीन धर्म को छोड़ दो, विद्याविहीन गुरु को छोड़ दो,
झगड़ालू और क्रोधी स्त्री को छोड़ दो और स्नेहविहीन
बंधु-बांधवों को छोड़ दो॥16॥
भाव यह है कि ऐसे धर्म को कभी नहीं अपनाना चाहिए,
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