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सम्पूर्ण चाणक्य नीति एवं राजनीति सूत्र

सम्पूर्ण चाणक्य नीति एवं राजनीति सूत्र

Sampurna Chanakya Niti & Rajaniti Sutras

आचार्य चाणक्य (विष्णुगुप्त / कौटिल्य) द्वारा

DevanagariHindipublished196 पृष्ठ

पृष्ठ 55, कुल 196 में से

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भाव यह है कि जिस कुल में साधु-महात्मा जैसा
कोई पुत्र उत्पन्न हो जाता है, उसके संसर्ग से बाकी सभी लोगों
का भी सांस्कारिक परिष्कार हो जाता है।
दर्शनध्यानसंस्पर्शैर्मत्सी कूर्मी च पक्षिणी।
शिशुं पालयते नित्यं तथा सज्जनसंगतिः॥
जिस प्रकार मछली देख-रेख से, कछुवी चिड़िया स्पर्श से (चोंच
द्वारा) सदैव अपने बच्चों का पालन-पोषण करती हैं, वैसे ही अच्छे
लोगों के साथ से सर्व प्रकार से रक्षा होती है॥३॥
यहां चाणक्य ने सद्-संगति पर जोर दिया है। अच्छे लोगों का
साथ होने पर किसी प्रकार की हानि नहीं होती। सज्जनों का साथ
सदैव सुखकारी और हितरक्षक होता है।
यावत्स्वस्थो ह्ययं देहो यावन्मृत्युश्च दूरतः।
तावदात्महितं कुर्यात् प्राणान्ते किं करिष्यति॥
यह नश्वर शरीर जब तक निरोग व स्वस्थ है या जब तक मृत्यु
नहीं आती, तब तक मनुष्य को अपने सभी पुण्य-कर्म कर लेने
चाहिए क्योंकि अंत समय आने पर वह क्या कर पाएगा॥४॥
समय किसी की प्रतीक्षा नहीं करता। समय गुजरता जाता है
इसीलिए किसी कार्य को कल पर नहीं छोड़ना चाहिए। कहा भी
है—‘कल करे सो आज कर, आज करे सो अब। पल में परलय
होएगी, फेर करेगा कब?’ अतः समय का कोई भरोसा नहीं। जो
पुण्य-कर्म करने हैं, अभी कर लेने चाहिए, फिर समय नहीं
मिलेगा।
कामधेनुगुणा विद्या ह्यकाले फलदायिनी।
प्रवासे मातृसदृशी विद्या गुप्तं धनं स्मृतम्॥
विद्या कामधेनु के समान सभी इच्छाएं पूर्ण करने वाली
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