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सम्पूर्ण चाणक्य नीति एवं राजनीति सूत्र

सम्पूर्ण चाणक्य नीति एवं राजनीति सूत्र

Sampurna Chanakya Niti & Rajaniti Sutras

आचार्य चाणक्य (विष्णुगुप्त / कौटिल्य) द्वारा

DevanagariHindipublished196 पृष्ठ

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पृष्ठ 51

एकेनाऽपि सुवृक्षेण पुष्पितेन सुगन्धिना।
वासितं तद्वनं सर्वं सुपुत्रेण कुलं यथा॥
एक ही सुगन्धित फूल वाले वृक्ष से जिस प्रकार सारा वन
सुगन्धित हो जाता है, उसी प्रकार एक सुपुत्र से सारा कुल
सुशोभित हो जाता है।।14।।
अच्छे गुण सभी जगह प्रशंसित होते हैं। उनकी लोक प्रसिद्धि
सुगन्धित पुष्प की भांति सभी जगह फैल जाती है। किसी कुल
का एक सुपुत्र सारे कुल को सम्मानित करा देता है।
एकेन शुष्कवृक्षेण दह्यमानेन वह्निना।
दह्यते तद्वनं सर्वं कुपुत्रेण कुलं तथा॥
आग से जलते हुए सूखे वृक्ष से सारा वन जल जाता है जैसे कि
एक कुपुत्र से कुल का नाश हो जाता है।।15।।
कुल का विनाश करने के लिए एक ही कुपुत्र काफी होता है।
ठीक उसी प्रकार जैसे एक जलता हुआ वृक्ष पूरे वन को जलाकर
खाक कर देता है। भाव यही है कि सद्गृहस्थ को अपनी संतान
पर पूरा ध्यान रखना चाहिए।
एकेनापि सुपुत्रेण विद्यायुक्तेन साधुना।
आह्लादितं कुलं सर्वं यथा चन्द्रेण शर्वरी॥
जिस प्रकार चन्द्रमा से रात्रि की शोभा होती है, उसी प्रकार
एक सुपुत्र, अर्थात साधु प्रकृति वाले पुत्र से कुल आनन्दित होता
है।।16।।
किसी परिवार में यदि साधु प्रकृति का विद्वान पुत्र उत्पन्न होता
है तो वह अपनी विद्वता से पूरे परिवार को और समाज को उसी
प्रकार से आनन्दित कर देता है, जैसे चन्द्रमा अपनी शीतल चांदनी
से रात्रि को जगमग कर देता है।
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CC0. Vasistha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri