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सम्पूर्ण चाणक्य नीति एवं राजनीति सूत्र

सम्पूर्ण चाणक्य नीति एवं राजनीति सूत्र

Sampurna Chanakya Niti & Rajaniti Sutras

आचार्य चाणक्य (विष्णुगुप्त / कौटिल्य) द्वारा

DevanagariHindipublished196 पृष्ठ

पृष्ठ 25, कुल 196 में से

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करने के लिए सच्चा मित्र, सच्चा बंधु होने का ढोंग
रचाते हैं और जब अपना स्वार्थ सिद्ध हो जाता है तो किनारा
कर लेते हैं। सच्चा बंधु (सगा, संबंधी, घनिष्ठ मित्र) केवल वही
है जो दैहिक, दैविक और भौतिक, किसी भी प्रकार का संकट
पड़ने पर काम आए। यदि व्यक्ति रोगी हो गया है तो उसकी
परिचर्या करने में और अकाल आदि पड़ने पर अपने बंधु की
यथासंभव मदद करे। शत्रु द्वारा प्रताड़ित किए जाने पर, किसी भी
प्रकार की राजकीय समस्या आ जाने पर और शोक के अवसर
पर बराबर साथ दे—वही सच्चे अर्थों में बंधु कहलाने का
अधिकारी है।
दूसरे अर्थों में जब मनुष्य के पास सभी सुख-समृद्धि हो, उसे
किसी प्रकार का कोई दुःख न हो तो सभी उसके मित्र बने रहते
हैं, परंतु जब वह दुःख से घिर जाता है तो उसका कोई साथ नहीं
देता। इस संसार में सभी सुख के साथी हैं, दुःख पड़ने पर कोई भी
सहायता करने को तैयार नहीं होता और जो सहायता करता है, वही
मनुष्य का सच्चा बंधु अथवा मित्र कहलाता है।
यो ध्रुवाणि परित्यज्य अध्रुवं परिषेवते।
ध्रुवाणि तस्य नश्यन्ति अध्रुवं नष्टमेव च॥
जो अपने निश्चित कर्मों अथवा वस्तु का त्याग करके,
अनिश्चित की चिंता करता है, उसका अनिश्चित लक्ष्य तो नष्ट
होता ही है, निश्चित भी नष्ट हो जाता है।।13।।
किसी ने सही कहा है—'आधी को छोड़, सारी को धावे,
आधी मिले न पूरी पावे।' जो व्यक्ति अपने निश्चित लक्ष्य से
भटक जाता है, उसका कोई भी लक्ष्य पूरा नहीं होता। भाव यही
है कि आदमी को उन्हीं कार्यों में हाथ डालना चाहिए, जिन्हें
वह पूरा करने की सामर्थ्य रखता है। यदि वह अपनी
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