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सम्पूर्ण चाणक्य नीति एवं राजनीति सूत्र

सम्पूर्ण चाणक्य नीति एवं राजनीति सूत्र

Sampurna Chanakya Niti & Rajaniti Sutras

आचार्य चाणक्य (विष्णुगुप्त / कौटिल्य) द्वारा

DevanagariHindipublished196 पृष्ठ

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चाणक्य का मत है कि राजनीति में कभी-कभी
कुछ कर्म ऐसे दिखाई पड़ते हैं जिन्हें देखकर सोचना पड़ता है
कि यह उचित हुआ या अनुचित, परंतु जिस अनीति कार्य से भी
जन-कल्याण होता हो अथवा धर्म का पक्ष प्रबल होता हो तो उस
अनैतिक कार्य को भी नीति सम्मत ही माना जाएगा। उदाहरण के
रूप में महाभारत के युद्ध में युधिष्ठिर द्वारा 'अश्वत्थामा' की मृत्यु
का उद्घोष करना यद्यपि नीति विरुद्ध था, पर नीति कुशल
योगीराज कृष्ण ने इसे उचित माना था, क्योंकि वे गुरु द्रोणाचार्य
के विकट संहार से अपनी सेना को बचाना चाहते थे।
तदहं संप्रवक्ष्यामि लोकानां हितकाम्यया।
येन विज्ञानमात्रेण सर्वज्ञत्वं प्रपद्यते॥
लोगों की हित कामना से मैं यहां उस शास्त्र को कहूंगा,
जिसके जान लेने से मनुष्य सब कुछ जान लेने वाला-सा हो
जाता है॥3॥
यहां चाणक्य ने संकेत दिया है कि जो व्यक्ति राजनीति से
सम्बन्धित उनकी नीतियों को जान लेगा, वह राजनीति का
प्रकाण्ड पंडित हो जाएगा। वस्तुतः चाणक्य ने राजनीति के
विषय में शास्त्रों का गूढ़ अध्ययन किया था तथा उनका सूक्ष्म
परीक्षण भी किया था।
अपने जीवन का अनुभव उन्होंने पूरी ईमानदारी के साथ इन
श्लोकों में उतार दिया है।
मूर्खशिष्योपदेशेन दुष्टस्त्रीभरणेन च।
दुःखितैः सम्प्रयोगेण पण्डितोऽप्यवसीदति॥
मूर्ख छात्रों को पढ़ाने तथा दुष्ट स्त्री के पालन-पोषण से और
दुःखियों के साथ संबंध रखने से, बुद्धिमान व्यक्ति भी दुःखी
होता है। तात्पर्य यह कि मूर्ख शिष्य को कभी भी उचित
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