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सम्पूर्ण चाणक्य नीति एवं राजनीति सूत्र

सम्पूर्ण चाणक्य नीति एवं राजनीति सूत्र

Sampurna Chanakya Niti & Rajaniti Sutras

आचार्य चाणक्य (विष्णुगुप्त / कौटिल्य) द्वारा

DevanagariHindipublished196 पृष्ठ

पृष्ठ 159, कुल 196 में से

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पृष्ठ 159

भाव यह है कि ब्राह्मण को भोजन कराने के
बाद ही भोजन करना चाहिए और बिना किसी प्रकार के
दिखावे के जो परोपकार किया जाता है, उसे ही सच्चा धर्म
मानना चाहिए।
मणिलुंठति पादाग्रे काचः शिरसि धार्यते।
क्रयविक्रयवेलायां काचः काचो मणिर्मणिः॥
मणि पैरों में पड़ी हो और कांच सिर पर धारण किया गया हो,
परंतु क्रय-विक्रय करते समय अर्थात मोल-भाव करते समय
मणि मणि ही रहती है और कांच कांच ही रहता है॥9॥
भाव यह है कि समय अथवा भाग्य के कारण विद्वान व्यक्ति
का भले ही सम्मान न हो, पर जब मूल्यांकन का समय आता है
तो विद्वान की विद्वता को कोई चुनौती नहीं दे सकता। योग्य
व्यक्ति की अलग ही पहचान होती है और अयोग्य व्यक्ति की
जग-हंसाई ही होती है।
अनन्तशास्त्रं बहुलाश्च विद्याः अल्पश्च कालो बहुविघ्नता च।
यत्सारभूतं तदुपासनीयं, हंसो यथा क्षीरमिवाम्बुमध्यात्॥
शास्त्रों का अंत नहीं है, विद्याएं बहुत हैं, जीवन छोटा है,
विघ्न-बाधाएं अनेक हैं। अतः जो सार तत्त्व है, उसे ही ग्रहण करना
चाहिए, जैसे हंस जल के बीच से दूध को पी लेता है॥10॥
मानव जीवन बहुत छोटा है और इस संसार में ज्ञान अपरिमित
है। पूरे जीवन में सारे ज्ञान को नहीं पाया जा सकता इसलिए ज्ञान
के उस सार तत्त्व को ग्रहण करना चाहिए जो सत्य है।
दूरागतं पथि श्रान्तं वृथा गृहमागतम्।
अनर्चयित्वा यो भुंक्ते स वै चाण्डाल उच्यते॥
अचानक दूर से आए थके-हारे पथिक से बिना पूछे ही
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CC0. Vasishtha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri