सम्पूर्ण चाणक्य नीति एवं राजनीति सूत्र
Sampurna Chanakya Niti & Rajaniti Sutras
आचार्य चाणक्य (विष्णुगुप्त / कौटिल्य) द्वारा
पृष्ठ 157, कुल 196 में से
संदर्भ में पढ़ेंहै, जबकि ब्रह्म 'नित्य' है, अजन्मा है, सदैव से है
और अनन्त काल तक रहेगा। उसका कोई ओर-छोर नहीं, तो
यह उपदेश पाने के बाद शिष्य के लिए किसी अन्य उपदेश को
पाने की आवश्यकता नहीं रह जाती।
खलानां कण्टकानां च द्विविधैव प्रतिक्रिया।
उपानान्मुखभंगो वा दूरतो वा विसर्जनम्॥
दुष्टों और कांटों से बचने के दो ही उपाय हैं, जूतों से उन्हें कुचल
डालना व उनसे दूर रहना॥३॥
भाव यह है कि दुष्ट और कांटे सदैव कष्ट ही पहुंचाने वाले
होते हैं। इनसे बचकर रहना ही ठीक रहता है। यदि इनसे सामना
हो ही जाए तो इन्हें जूतों से कुचल डालना चाहिए।
कुचैलिनं दंतमलोपसृष्टं, बह्वाशिनं निष्ठुरभाषिणं च।
सूर्योदये चास्तमिते शयानं, विमुंचति श्रीर्यदि चक्रपाणिः॥
गंदे वस्त्र धारण करने वाले, दांतों पर मैल जमाए रखने वाले,
अत्यधिक भोजन करने वाले, कठोर वचन बोलने वाले, सूर्योदय
से सूर्यास्त तक सोने वाले को, चाहे वह साक्षात विष्णु ही क्यों
न हो, लक्ष्मी त्याग देती है॥4॥
ऐसे व्यक्ति आलसी, कामचोर, पेटू, क्रोधी और निकम्मे
होते हैं। ऐसे लोगों के पास धन-सम्पति कभी नहीं आती। यदि
आती भी है तो वह शीघ्र ही नष्ट हो जाती है, परंतु जो व्यक्ति
स्वच्छ रहेगा, कर्मठ होगा, वही धन-वैभव जुटाने में कामयाब
होता है।
त्यजन्ति मित्राणि धनैर्विहीनं, दाराश्च भृत्याश्च सुहृज्जनाश्च।
तं चार्थवन्तं पुनराश्रयंते, अर्थो हि लोके पुरुषस्य बंधुः॥
निर्धन होने पर मनुष्य को उसके मित्र, स्त्री, नौकर और
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