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सर्वकोश
सम्पूर्ण चाणक्य नीति एवं राजनीति सूत्र

सम्पूर्ण चाणक्य नीति एवं राजनीति सूत्र

Sampurna Chanakya Niti & Rajaniti Sutras

आचार्य चाणक्य (विष्णुगुप्त / कौटिल्य) द्वारा

DevanagariHindipublished196 पृष्ठ

पृष्ठ 144, कुल 196 में से

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बन्धाय विषयाऽऽसक्तं मुक्त्ये निर्विषयं मनः।
मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः॥
मन को विषयहीन अर्थात् माया-मोह से मुक्त करके ही मोक्ष
की प्राप्ति हो सकती है क्योंकि मन में विषय-वासनाओं के
आवागमन के कारण ही मनुष्य माया-मोह के जाल में आसक्त
रहता है। अतः मोक्ष (जीवन-मरण) से छुटकारा पाने के लिए
मन का विकाररहित होना आवश्यक है॥11॥
आचार्य चाणक्य ने प्रस्तुत श्लोक में व्याख्या दी है कि मन ही
बंधन और मोक्ष का कारण है।
अतः मन को जीतने का प्रयत्न करना चाहिए।
देहाभिमाने गलिते विज्ञाते परमात्मनि।
यत्र यत्र मनो याति तत्र तत्र समाधयः॥
परम तत्त्वज्ञान प्राप्त होने पर जब मनुष्य देह के अभिमान को
छोड़ देता है अर्थात् जब उसे आत्मा-परमात्मा की नित्यता और
शरीर की क्षणभंगुरता का ज्ञान हो जाता है तो वह इस शरीर के
मोह को छोड़ देता है। तदुपरान्त उसका मन जहां-जहां भी जाता
है, वहां-वहां उसे सिद्ध पुरुषों की समाधियों की अनुभूति होती
है॥12॥
भाव यह है कि जाग्रत-अवस्था में होते हुए भी वह समाधि
जैसी स्थिति में आ जाता है।
ईप्सितं मनसः सर्वं कस्य सम्पद्यते सुखम्।
दैवाऽऽयत्तं यतः सर्वं तस्मात् संतोषमाश्रयेत्॥
मन की इच्छा के अनुसार सारे सुख किसको मिलते हैं? अर्थात्
किसी को नहीं मिलते। इससे यह सिद्ध होता है कि 'दैव' के ही
बस में सब कुछ है। अतः संतोष का ही आश्रय लेना चाहिए।
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