सम्पूर्ण चाणक्य नीति एवं राजनीति सूत्र
Sampurna Chanakya Niti & Rajaniti Sutras
आचार्य चाणक्य (विष्णुगुप्त / कौटिल्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें॥ अथ द्वादश अध्याय ॥
सानन्दं सदनं सुताश्च सुधियः कान्ता प्रियालापिनी,
सुधनं सन्मित्रं स्वयोषिति रतिः स्वाऽऽज्ञापराः सेवकाः
आतिथ्यं शिवपूजनं प्रतिदिनं मिष्टान्नपानं गृहे,
साधोः संगमुपासते च सततं धन्यो गृहस्थाश्रमः॥
घर आनन्द से युक्त हो, संतान बुद्धिमान हो, पत्नी
मधुर वचन बोलने वाली हो, इच्छापूर्ति के लायक धन हो, पत्नी
के प्रति प्रेम भाव हो, आज्ञाकारी सेवक हो, अतिथि का
सत्कार और श्री शिव का पूजन प्रतिदिन हो, घर में मिष्ठान
व शीतल जल मिला करे और महात्माओं का सत्संग
प्रतिदिन मिला करे तो ऐसा गृहस्थाश्रम सभी आश्रमों से अधिक
धन्य है। ऐसे घर का स्वामी अत्यंत सुखी और सौभाग्यशाली होता
है॥1॥
जहां सदा आनंद की तरंगें उठती हैं, पुत्र और पुत्रियां
बुद्धिमान और बुद्धिमती, पत्नी मधुरभाषिणी, परिश्रम से कमाया
विपुल धन, उत्तम मित्र, पत्नी से अनुराग, नौकर से अच्छी सेवा
मिलती हो।
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