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सम्पूर्ण चाणक्य नीति एवं राजनीति सूत्र

सम्पूर्ण चाणक्य नीति एवं राजनीति सूत्र

Sampurna Chanakya Niti & Rajaniti Sutras

आचार्य चाणक्य (विष्णुगुप्त / कौटिल्य) द्वारा

DevanagariHindipublished196 पृष्ठ

पृष्ठ 125, कुल 196 में से

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पृष्ठ 125

निरंतर वन से प्रेम रखने वाला और प्रतिदिन श्राद्ध
करने वाला ब्राह्मण ऋषि कहलाता है॥11॥
भाव यह है कि जो संतुष्ट होकर भोजन करता है, गृहस्थी के
मोह-बंधन में जो नहीं बंधा हुआ है और जो प्रतिदिन अपने पूर्वजों
को याद करता है, वह ऋषि-मुनियों के ही समान तपस्वी है।
एकाहारेण संतुष्टः षट्कर्मनिरतः सदा।
ऋतुकालाभिगामी च स विप्रो द्विज उच्यते॥
जो व्यक्ति एक बार के भोजन से संतुष्ट हो जाता है, छः कर्मों
(यज्ञ करना, यज्ञ कराना, पढ़ना, पढ़ाना, दान देना, दान लेना)
में लगा रहता है और अपनी स्त्री से ऋतुकाल (मासिक धर्म) के
बाद ही प्रसंग करता है, वही ब्राह्मण कहलाने का सच्चा अधि
कारी है॥12॥
आचार्य चाणक्य के उपरोक्त श्लोक के संदर्भ में ऋतु
कालगामी होने की व्याख्या इस प्रकार है—स्त्रियों का
स्वाभाविक ऋतुकाल सोलह रात्रि का है। उसमें से चार रात्रि
अर्थात रजोदर्शन से लेकर चार दिन निंदित हैं। ग्यारहवीं और
तेरहवीं रात्रि भी निंदित हैं। शेष दस रात्रियां ऋतु दान में श्रेष्ठ हैं।
जो संतान प्राप्ति के लिए ऐसी दस रात्रियों में समागम करता है
वह ऋतुकालगामी कहलाता है।
लौकिके कर्मणि रतः पशूनां परिपालकः।
वाणिज्यकृषिकर्ता यः स विप्रो वैश्य उच्यते॥
जो ब्राह्मण दुनियादारी के कामों में लगा रहता है, पशुओं का
पालन करने वाला और व्यापार तथा खेती करता है, वह वैश्य
(वणिक) कहलाता है॥13॥
यहां आचार्य चाणक्य के कहने का आशय यह है कि जन्म
से कोई ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य या शूद्र नहीं होता।
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