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सम्पूर्ण चाणक्य नीति एवं राजनीति सूत्र

सम्पूर्ण चाणक्य नीति एवं राजनीति सूत्र

Sampurna Chanakya Niti & Rajaniti Sutras

आचार्य चाणक्य (विष्णुगुप्त / कौटिल्य) द्वारा

DevanagariHindipublished196 पृष्ठ

पृष्ठ 113, कुल 196 में से

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पृष्ठ 113

सुखार्थी चेत् त्यजेद् विद्यां विद्यार्थी चेत् त्यजेत् सुखम्।
सुखार्थिनः कुतो विद्या विद्यार्थिनः कुतः सुखम्॥
विद्यार्थी को यदि सुख की इच्छा है और वह परिश्रम करना
नहीं चाहता तो उसे विद्या प्राप्त करने की इच्छा का त्याग कर देना
चाहिए। यदि वह विद्या चाहता है तो उसे सुख-सुविधाओं का
त्याग करना होगा क्योंकि सुख चाहने वाला विद्या प्राप्त नहीं कर
सकता। दूसरी ओर विद्या प्राप्त करने वालों को आराम नहीं मिल
सकता॥३॥
आचार्य चाणक्य ने उक्त श्लोक के माध्यम से कहा है कि
सुख और विद्याप्राप्ति में वैसे ही संधि असंभव है जैसे-जैसे प्रकाश
और अंधकार का मेल। एक के रहते दूसरे का अस्तित्व खोया
रहता है।
कवयः किं न पश्यन्ति किं न कुर्वन्ति योषितः।
मद्यपाः किं न जल्पन्ति किं न भक्ष्यन्ति वायसाः॥
कवि लोग क्या नहीं देखते? स्त्रियां क्या नहीं कर सकतीं?
मदिरा पीने वाले क्या-क्या नहीं बकते? कौवे क्या-क्या नहीं
खाते?॥४॥
'जहां न पहुंचे रवि, वहां पहुंचे कवि' यह उक्ति बहुत प्रसिद्ध
है कि जहां सूर्य की रश्मियां भी नहीं पहुंच पातीं, वहां कवि की
कल्पना पहुंच जाती है।
स्त्री जब अपनी पर आती है तो वह कुछ भी कर सकती है।
शराबी जब नशे में हो जाते हैं तो कुछ उल्टा-सीधा बकने लगते
हैं और कौवे न खाने योग्य खाद्य पदार्थ भी खा लेते हैं।
भाव यह है कि विद्वान व्यक्ति सभी कार्य सोच-समझकर
करता है और नीच व्यक्ति अपने विवेक से कार्य नहीं
करता।
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