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सम्पूर्ण चाणक्य नीति एवं राजनीति सूत्र

सम्पूर्ण चाणक्य नीति एवं राजनीति सूत्र

Sampurna Chanakya Niti & Rajaniti Sutras

आचार्य चाणक्य (विष्णुगुप्त / कौटिल्य) द्वारा

DevanagariHindipublished196 पृष्ठ

पृष्ठ 108, कुल 196 में से

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पृष्ठ 108

अहिं नृपं च शार्दूलं किटिंच बालकं तथा।
परश्वानं च मूर्खं च सप्त सुप्तान् बोधयेत् ॥
सांप, राजा, सिंह, बर्र (ततैया) और बालक, दूसरे का कुत्ता तथा
मूर्ख व्यक्ति, इन सातों को सोते से नहीं जगाना चाहिए। इन्हें जगाने
से हानि ही हो सकती है॥7॥
आचार्य चाणक्य ने उपरोक्त श्लोक में जिन सात को सोते से
न जागने की बात कही है उनकी हानि इस प्रकार है—सांप डस
लेगा, राजा दंड देगा, व्याघ्र या चीता आक्रमण कर मार डालेगा,
बालक रोने लगेगा, दूसरों का कुत्ता जगाए जाने पर काट लेगा,
मूर्ख व्यक्ति विवाद करने लगेगा।
अर्थाऽधीताश्च यैर्वेदास्तथा शूद्रान्नभोजिनाः।
ते द्विजाः किं करिष्यन्ति निर्विषा इव पन्नगाः ॥
धन के लिए वेद पढ़ाने वाले तथा शूद्रों के अन्न को खाने वाले
ब्राह्मण विषहीन सर्प की भांति क्या कर सकते हैं, अर्थात वे
किसी को न तो शाप दे सकते हैं, न वरदान॥8॥
जो ब्राह्मण केवल धन के लिए ही अपनी विद्या को बेचते हैं,
शूद्रों के यहां का भोजन करने से भी संकोच नहीं करते, ऐसे
ब्राह्मणों की विद्या उस सर्प के समान है, जिसके मुख में विष की
थैली ही नहीं है। अर्थात वे किसी को न तो शाप दे सकते हैं, न
वरदान।
यस्मिन् रुष्टे भयं नास्ति तुष्टे नैव धनाऽऽगमः।
निग्रहोऽनुग्रहो नास्ति स रुष्टः किं करिष्यति ॥
जिसके नाराज होने का डर नहीं है और प्रसन्न होने से कोई
लाभ नहीं है, जिसमें दंड देने या दया करने की सामर्थ्य नहीं है,
वह नाराज होकर क्या कर सकता है?॥9॥
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