सम्पूर्ण चाणक्य नीति एवं राजनीति सूत्र
Sampurna Chanakya Niti & Rajaniti Sutras
आचार्य चाणक्य (विष्णुगुप्त / कौटिल्य) द्वारा
पृष्ठ 102, कुल 196 में से
संदर्भ में पढ़ेंनिर्गुणस्य हतं रूपं दुःशीलस्य हतं कुलम्।
असिद्धस्य हता विद्या अयभोगेन हतं धनम्॥
गुणहीन व्यक्ति की सुंदरता व्यर्थ है, दुष्ट स्वभाव वाले व्यक्ति
का कुल नष्ट होने योग्य है, यदि लक्ष्य की सिद्धि न हो तो विद्या
व्यर्थ है, जिस धन का सदुपयोग न हो, वह धन व्यर्थ है।।15।।
आचार्य चाणक्य ने प्रस्तुत श्लोक में गुण और आचरण की बात
कही है, वहीं विद्या के विषय में भी बताया है। विद्या जो
आजीविका उपलब्ध न करा सके वह उसी तरह व्यर्थ है जैसे ध
न उपयोग में आए बगैर अनुपयोगी पड़ा हुआ है।
शुद्धं भूमिगतं तोयं शुद्धा नारी पतिव्रता।
शुचिः क्षेमकरो राजा संतोषी ब्राह्मणः शुचिः॥
पृथ्वी के भीतर का पानी शुद्ध होता है, पतिव्रता स्त्री पवित्र
होती है, कल्याण करने वाला राजा पवित्र होता है और संतोषी
ब्राह्मण पवित्र होता है।।16।।
आचार्य चाणक्य ने प्रस्तुत श्लोक के माध्यम से जानकारी
दी है कि भूमि के भीतर प्रविष्ट हुआ जल पवित्र होता है। वर्षा
का अधिकांश जल तो बहकर नाले-नदियों द्वारा समुद्र में चला
जाता है। यही जल कुओं, नदियों और तालाबों में भूमि के स्रोतों
से आता रहता है।
असंतुष्टाः द्विजा नष्टाः संतुष्टाश्च महीभृतः।
सलज्जा गणिका नष्टाः निर्लज्जाश्च कुलांगना॥
असंतोषी ब्राह्मण और संतोषी राजा (जल्दी ही) नष्ट हो जाते
हैं। लज्जाशील वेश्या और निर्लज्ज कुलीन स्त्री नष्ट हो जाती
है।।17।।
लोभ से प्रेरित ब्राह्मण आदर का पात्र नहीं रहता और
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