सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

Samba Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा

स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)

DevanagariHindipublished424 पृष्ठ

पृष्ठ 100, कुल 424 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 100

९० श्रीसाम्बपुराणम्

धर्मसावर्णि, दक्षसावर्णि—ये पञ्च सावर्णि हैं। शेष दो लोग हैं—रौत्य तथा भौत्य। ये सब मनुगण हैं॥२३-२६॥

इन्द्रस्तु विष्णुर्विज्ञेयो विपश्चित्तदनन्तरम्।
अद्भुतस्त्रिदिवश्चैव दशमस्त्विन्द्र उच्यते॥२७॥
सुशान्तिश्च सुकीर्तिश्च ऋतुधामा दिवस्पतिः।
इति भूता भविष्याश्च ज्ञेया इन्द्राश्चतुर्दश॥२८॥
कश्यपोऽत्रिर्वशिष्ठश्च भरद्वाजोऽथ गौतमः।
विश्वामित्रो जमदग्निश्च सप्तैते ऋषयः स्मृता॥२९॥

इन्द्र को विष्णु जानना चाहिये। तदनन्तर विपश्चित्, अद्भुत एवं त्रिदिव को दशम इन्द्र कहा गया है। सुशान्ति, सुकीर्ति, ऋतुधामा तथा दिवस्पति—ये अतीत के इन्द्र थे। भविष्यत् के इन्द्र चौदह हैं। कश्यप, अत्रि, वशिष्ठ, भरद्वाज, गौतम, विश्वामित्र तथा जमदग्नि ये सात प्रसिद्ध ऋषि हैं॥२७-२९॥

अतः परं प्रवक्ष्यामि मरुतोऽग्नीन् पितॄन् ग्रहान्।
प्रवहोऽथावहश्चैव उद्वहः संवहस्तथा॥३०॥
विवाहो निवहश्चैव परिवाहस्तथैव च।
अन्तरिक्षचरा ह्येते पृथङ्मार्गविचारिणः॥३१॥

अब मरुद्गण, अग्निसमूह, पितृगण, सभी ग्रह, प्रवह, आवह, उद्वह, संवह, विवाह, निवह एवं परिवाह—ये पृथक्-पृथक् पथ में विचरणशील अन्तरिक्षचारी हैं॥३०-३१॥

महेन्द्रेण प्रभिन्नाङ्गा मरुतः सप्त कीर्त्तिताः॥३२॥

महेन्द्र द्वारा किये गये भिन्न-भिन्न अंगों के कारण मरुद्गण सात कहे गये हैं॥३२॥

शौराग्निः शुचिनामा तु वैद्युतः पावकः स्मृतः।
निर्मथ्यपरमोऽन्योऽग्निस्त्रयः प्रोक्ता इमेऽग्नयः॥३३॥

शुचिनामक शौराग्नि, वैद्युताग्नि पावक हैं। अपर निर्मथ्यमान (अरणि काष्ठ के मन्थनजनित अग्नि) अग्नि, ये तीन अग्नि कही गयी हैं॥३३॥

अग्नीनां पुत्रपौत्रांश्च चत्वारिंशन्नवैव तु।
मरुतामपि सर्वेषां विज्ञेयाः सप्तसप्तकाः॥३४॥

अग्नि के पुत्र तथा पौत्रगण चालीस हैं तथा ऐसे ही मरुद्गण भी उनचास हैं॥३४॥

एवं संवत्सरो ह्यग्निर्ऋतवस्तस्य जज्ञिरे।
ऋतुपुत्रार्त्तवाः पञ्च इति सर्गः सनातनः॥३५॥