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समयसार (प्राकृत गाथा एवं हिन्दी-अंग्रेजी व्याख्या)

समयसार (प्राकृत गाथा एवं हिन्दी-अंग्रेजी व्याख्या)

Samayasara of Acharya Kundakunda with Hindi Commentary

आचार्य कुन्दकुन्द / अमृतचन्द्र सूरि द्वारा

DevanagariHindipublished226 पृष्ठ

पृष्ठ 22, कुल 226 में से

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पृष्ठ 22

अध्याय - 1
एकत्व की दुर्लभता -
सुदपरिचिदाणुभूदा सव्वस्स वि कामभोगबंधकहा।
एयत्तस्सुवलंभो णवरि ण सुलहो विहत्तस्स॥ (1-4-4)
काम (स्पर्शन और रसना इन्द्रिय), भोग (घ्राण, चक्षु और श्रोत्र) इन पाँचों इन्द्रियों
के सम्बन्ध की और बन्ध की कथा सभी जीवों की सुनी हुई है, परिचित है और
अनुभव में आई हुई है, केवल रागादि से भिन्न एकत्व की प्राप्ति सुलभ नहीं है।
विशेष - सुदपरिचिदाणुभूदा-सुद (ज्ञान), परिचिद (श्रद्धा), अणुभूदा (चारित्र)
अर्थात् इस पद से यहाँ मिथ्याज्ञान, मिथ्यादर्शन और मिथ्याचारित्र लिये गये हैं।
Tales involving pleasures of five senses – kāma (sensuous
pleasures involving touch and taste), and bhog (sensuous
pleasures involving smell, sight and hearing) – and of karmic
attachment have been heard, known, and experienced by all.
Only the attainment of Self that is free from all attachments is
not easy.
Note: The words – heard, known, and experienced – mentioned
above, refer to wrong belief, knowledge, and conduct,
respectively, in the verse.
आचार्य की प्रतिज्ञा -
तं एयत्तविहत्तं दाएहं अप्पणो सविहवेण।
जदि दाएँज्ज पमाणं चुक्केज्ज छलं ण घेत्तव्वं॥ (1-5-5)
(आचार्य कुन्दकुन्द कहते हैं कि) मैं उस एकत्व विभक्त (अभेद रत्नत्रय रूप
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