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सर्वकोश
समयसार (प्राकृत गाथा एवं हिन्दी-अंग्रेजी व्याख्या)

समयसार (प्राकृत गाथा एवं हिन्दी-अंग्रेजी व्याख्या)

Samayasara of Acharya Kundakunda with Hindi Commentary

आचार्य कुन्दकुन्द / अमृतचन्द्र सूरि द्वारा

DevanagariHindipublished226 पृष्ठ

पृष्ठ 18, कुल 226 में से

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पृष्ठ 18

ॐ
नमः समयसाराय
सिरि कुन्दकुन्दारिय
समय पाहुडं
अह मंगलायरणं
वंदित्ति सव्वसिद्धे धुवमचलमणोवमं गदिं पत्ते।
वोच्छामि समयपाहुडमिणमो सुदकेवलीभणिदं॥ (1-1-1)
हे भव्यजीवों! मैं शाश्वत, अचल और अनुपम (निखिलोपमारहित) पंचम गति को
प्राप्त सर्व सिद्धों को नमस्कार करके श्रुत केवलियों द्वारा कहे गये इस समयप्राभृत
को कहूँगा।
विशेष - वोच्छामि पद का प्रयोग आचार्य कुन्दकुन्द ने 'सुदकेवलीभणिदं' की
समीचीन संगति के लिए किया है। इस पद के प्रयोग से उन्होंने कहा है कि मैं
श्रुतकेवली प्रणीत का वक्ता मात्र हूँ, कर्त्ता नहीं।
'ओ' पद का प्रयोग आचार्य ने समस्त भव्य प्राणियों के संबोधनार्थ किया है।
INVOCATION
O bhavyas (potential aspirants to liberation)! Making obeisance
to all the Siddhas, established in the fifth state of existence that
is eternal, immutable, and incomparable (perfection par
excellence), I will articulate this Samayaprābhrita, which has
been propounded by the all-knowing Masters of Scripture.
Note: Āchārya Kundkund has used the word vochhāmi in
conjunction with sudkevalībhaṇidam. He thus declares that this
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