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समयसार (प्राकृत गाथा एवं हिन्दी-अंग्रेजी व्याख्या)

समयसार (प्राकृत गाथा एवं हिन्दी-अंग्रेजी व्याख्या)

Samayasara of Acharya Kundakunda with Hindi Commentary

आचार्य कुन्दकुन्द / अमृतचन्द्र सूरि द्वारा

DevanagariHindipublished226 पृष्ठ

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अध्याय - 5
संता दु णिरुवभोज्जा बाला इत्थी जहेव पुरिसस्स।
बंधदि ते उवभोज्जे तरुणी इत्थी जह णरस्स॥ (5-11-174)
होदूण णिरुवभोज्जा तह बंधदि जह हवंति उवभोज्जा।
सत्तट्ठविहा भूदा णाणावरणादिभावेहिं॥ (5-12-175)
एदेण कारणेण दु सम्मादिट्ठी अबंधगो भणिदो।
आसवभावाभावे ण पच्चया बंधगा भणिदा॥ (5-13-176)
सम्यग्दृष्टि जीव के पूर्व की सराग दशा में बाँधे हुए सभी द्रव्यास्त्रव सत्ता में विद्यमान
हैं। वे उपयोग के प्रयोगानुसार कर्म भाव के द्वारा (रागादि भाव प्रत्ययों के द्वारा) बन्ध
को प्राप्त होते हैं। सत्ता में विद्यमान रहते हैं फिर भी उदय से पूर्व वे भोगने योग्य नहीं
होते। जैसे बाल स्त्री पुरुष के लिए भोग्य नहीं होती। वे ही कर्म उदयकाल में भोगने
योग्य होने पर नये कर्मों को बाँधते हैं; जिस प्रकार तरुणी स्त्री पुरुष के लिए (भोग्य
होती है और पुरुष को रागभाव में बाँध लेती है)। वे पूर्वबद्ध कर्म भोगने के अयोग्य
होकर जैसे भोगने योग्य होते हैं, उसी प्रकार ज्ञानावरण आदि रूप से (आयु कर्म के
बिना) सात प्रकार के और (आयु कर्म सहित) आठ प्रकार के कर्मों को बाँधते हैं।
इसी कारण से सम्यग्दृष्टि जीव अबन्धक (कर्म-बन्ध न करने वाला) कहा गया है।
रागादि भावास्रव के अभाव में द्रव्य प्रत्यय बन्धकारक नहीं होते हैं।
In the right believer, all previously bonded karmas, which got
bonded when the Self was in the state of attachment, remain
existent. They get bonded due to the manifestation of conscious
dispositions of the Self, involving attachment etc. They are
existent but are not fit for enjoyment till they mature; just as a
child-wife is not fit for enjoyment by the husband. The same
bonded karmas, when they mature, are fit for enjoyment and, in
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