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सर्वकोश
सामवेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

सामवेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Samaveda Samhita with Hindi Translation

डा. रेखा व्यास द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished310 पृष्ठ

पृष्ठ 299, कुल 310 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 299

घृतस्य विभ्राष्टिमनु शुक्रशोचिष आजुह्वानस्य सर्पिषः.. (१)
हे अग्नि! आप को हम होता, धनवान, सर्वज्ञाता और ब्राह्मण (यज्ञवेत्ता) मानते हैं. आप
ऊंचाई की ओर स्वयं अपना मार्ग बनाते हैं. आप घी की आहुतियों से चमकीले हो जाते हैं.
हम आप की उपासना करते हैं. (१)
यजिष्ठं त्वा यजमाना हुवेम ज्येष्ठमङ्गिरसां विप्र मन्मभिर्विप्रेभिः शुक्र मन्मभिः.
परिज्मानमिव द्या ॐ होतारं चर्षणीनाम्.
शोचिष्केशं वृषणं यमिमा विशः प्रावन्तु जूतये विशः.. (२)
हे अग्नि! आप मनीषी हैं. ब्राह्मणों द्वारा रचे गए मंत्रों से हम यज्ञ में आप का आह्वान
करते हैं. आप होता, सर्वद्रष्टा व ऊंची लपटों वाले हैं. हम अपनी रक्षा के लिए आप की रक्षा
करते हैं. (२)
स हि पुरू चिदोजसा विरुक्मता दीद्यानो भवति द्रुहन्तरः परशुर्न द्रुहन्तरः.
वीळु चिद्यस्य समृत्तौ श्रुवद्वनेव यत्स्थिरम्.
निष्षहमाणो यमते नायते धन्वासहा नायते.. (३)
हे अग्नि! परशु (फरसे) से जैसे शत्रुओं का नाश किया जाता है, वैसे ही आप की
सामर्थ्य से शत्रुओं में भय फैल जाता है, उन का नाश हो जाता है. आप की कृपा से कितना
ही बलशाली शत्रु क्यों न हो, वह आप के वशीभूत हो जाता है. आप धनुषधारी वीर जैसे हैं.
आप पत्थर जैसे कठोर शत्रुओं का भी नाश कर देते हैं. (३)
अग्ने तव श्रवो वयो महि भ्राजन्ते अर्चयो विभावसो.
बृहद्भानो शवसा वाजमुक्थ्यं ३ दधासि दाशुषे कवे.. (४)
हे अग्नि! आप की हवि सराहनीय है. आप कवि (विद्वान्) और प्रकाशमान हैं. आप की
विशाल लपटें सुशोभित होती हैं. आप यजमानों को धन देते हैं. (४)
पावकवर्चाः शुक्रवर्चा अनूनवर्चा उदियर्षि भानुना.
पुत्रो मातरा विचरन्नुपावसि पृणक्षि रोदसी उभे.. (५)
हे अग्नि! आप की किरणें पवित्र, चमकीली व प्रखर हैं. आप सूर्य जैसे उदय होते हैं,
फिर आकाश में पूर्ण प्रकाशमय हो जाते हैं. माता के साथ घूमते हुए पुत्र की तरह आप
यजमानों के साथ रहते हैं. (५)
ऊर्जो नपाज्जातवेदः सुशस्तिभिर्मन्दस्व धीतिभिर्हितः.
त्वे इषः सं दधुर्भूरिवर्पसश्चित्रोतयो वामजाताः.. (६)
हे अग्नि! आप शक्तिमान व सर्वज्ञाता हैं. आप हमारी प्रशस्तियों को सुनिए, हमारी सेवा
से संतुष्ट होइए. आप विलक्षण व असंख्य रूपधारी हैं. आप यजमानों द्वारा दी गई हवि को
ग्रहण करने की कृपा कीजिए. (६)
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