श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 604, कुल 1299 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्लोक १६ ]
- साधक-संजीवनी *
६०३
महाराज कहते हैं—
आनंद-सिंधु-मध्य तव बासा।
बिनु जाने कस मरसि पियासा ॥ (विनयपत्रिका १३६।२)
आब्रह्मभुवनाल्लोकाः पुनरावर्तिनोऽर्जुन।
मामुपेत्य तु कौन्तेय पुनर्जन्म न विद्यते ॥ १६ ॥
| अर्जुन | = हे अर्जुन! | पुनः | लौटकर | माम् | = मुझे |
|---|---|---|---|---|---|
| आब्रह्मभुवनात्- | ब्रह्मलोकतक | संसारमें | आना | उपेत्य | = प्राप्त होनेपर |
| लोकाः | = सभी लोक | पड़ता है; | पुनर्जन्म | = पुनर्जन्म | |
| पुनरावर्तिनः | = पुनरावर्तीवाले हैं | तु | = परन्तु | न | = नहीं |
| अर्थात् वहाँ जानेपर | कौन्तेय | = हे कौन्तेय! | विद्यते | = होता। |
व्याख्या— * 'आब्रह्मभुवनाल्लोकाः पुनरावर्तिनो-
र्जुन'—हे अर्जुन! ब्रह्माजीके लोकको लेकर सभी लोक
पुनरावर्ती हैं, अर्थात् ब्रह्मलोक और उससे नीचेके जितने
लोक (सुखभोग-भूमियाँ) हैं, उनमें रहनेवाले सभी प्राणियोंको
उन-उन लोकोंके प्रापक पुण्य समाप्त हो जानेपर लौटकर
आना ही पड़ता है।
जितनी भी भोग-भूमियाँ हैं, उन सबमें ब्रह्मलोकको
श्रेष्ठ बताया गया है। मात्र पृथ्वीमण्डलका राजा हो और
उसका धन-धान्यसे सम्पन्न राज्य हो, स्त्री-पुरुष, परिवार
आदि सभी उसके अनुकूल हों, उसकी युवावस्था हो तथा
शरीर नीरोग हो—यह मृत्युलोकका पूर्ण सुख माना गया
है। मृत्युलोकके सुखसे सौ गुणा अधिक सुख मर्त्य
देवताओंका है। मर्त्य देवता उनको कहते हैं, जो पुण्यकर्म
करके देवलोकको प्राप्त होते हैं और देवलोकके प्रापक
पुण्य क्षीण होनेपर पुनः मृत्युलोकमें आ जाते हैं (गीता—
नवें अध्यायका इक्कीसवाँ श्लोक)। इन मर्त्य देवताओंसे
सौ गुणा अधिक सुख आजीवन देवताओंका है। आजीवन
देवता वे कहलाते हैं, जो कल्पके आदिमें देवता बने हैं
और कल्पके अन्ततक देवता बने रहेंगे। इन आजीवन
देवताओंसे सौ गुणा अधिक सुख इन्द्रका माना गया है।
इन्द्रके सुखसे सौ गुणा अधिक सुख ब्रह्मलोकका माना गया
है। इस ब्रह्मलोकके सुखसे भी अनन्त गुणा अधिक सुख
भगवत्प्राप्त, तत्त्वज्ञ, जीवन्मुक्त महापुरुषका माना गया है।
तात्पर्य यह है कि पृथ्वीमण्डलसे लेकर ब्रह्मलोकतकका
सुख सीमित, परिवर्तनशील और विनाशी है। परन्तु
भगवत्प्राप्तिका सुख अनन्त है, अपार है, अगाध है। यह
सुख कभी नष्ट नहीं होता। अनन्त ब्रह्मा और अनन्त
ब्रह्माण्ड समाप्त हो जायें, तो भी यह परमात्मप्राप्तिका सुख
कभी नष्ट नहीं होता, सदा बना रहता है।
'पुनरावर्तिनः' का एक भाव यह भी है कि ये प्राणी
साक्षात् परमात्माके अंश होनेके कारण नित्य हैं। अतः ये
जबतक नित्य तत्त्व परमात्माको प्राप्त नहीं कर लेते,
तबतक कितने ही ऊँचे लोकोंमें जानेपर भी इनको वहाँसे
पीछे लौटना ही पड़ता है। अतः ब्रह्मलोक आदि ऊँचे
लोकोंमें जानेवाले भी पुनर्जन्मको प्राप्त होते हैं।
यहाँ एक शंका होती है कि सन्तों, भक्तों, जीवन्मुक्तों
और कारकपुरुषोंके दर्शनमात्रसे जीवका कल्याण हो
जाता है और ब्रह्माजी स्वयं कारकपुरुष हैं तथा भगवान्के
भक्त भी हैं। ब्रह्मलोकमें जानेवाले ब्रह्माजीके दर्शन
करते ही हैं, फिर उनकी मुक्ति क्यों नहीं होती? वे
लौटकर क्यों आते हैं? इसका समाधान यह है कि वास्तवमें
कल्याण दर्शनमात्रसे नहीं होता, प्रत्युत अपनी भावना
विशेष होनेसे होता है। इसके सिवाय सन्त, भक्त
आदिके दर्शन, सम्भाषण, चिन्तन आदिका माहात्म्य इस
मृत्युलोकके मनुष्योंके लिये ही है। कारण कि यह
मनुष्य-शरीर केवल भगवत्प्राप्तिके लिये ही मिला है।
अतः मनुष्यको भगवत्प्राप्तिका कोई भी और किञ्चिन्मात्र
भी मुक्तिका उपाय मिल जाता है तो अपनी भावनाके
अनुसार वह मुक्त हो सकता है। ऐसा मुक्तिका अधिकार
अन्य लोकोंमें नहीं है, इसलिये वे मुक्त नहीं होते।
- 'आब्रह्मभुवनात्' पदमें जो 'आ' शब्द आया है, उसके दो अर्थ होते हैं—(१) अभिविधि—जैसे, ब्रह्मलोकको लेकर
सभी लोक अर्थात् ब्रह्मलोक तथा उससे नीचेके सभी लोक। (२) मर्यादा—जैसे ब्रह्मलोकको छोड़कर नीचेके सभी लोक
अर्थात् ब्रह्मलोकसे नीचेके सभी लोक। यहाँ 'आ' शब्द 'अभिविधि' अर्थमें आया है।