श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें- हिन्दी पद्यानुक्रमणिका *
१२९१
भगति हीन नर सोहड़..... ९। ३३
भले पधारे लम्बकनाथ ..... ९। २५
म
मति अति नीच..... ६। ४४
मनुवाँ तो चहुँ दिसि..... ३। २६
मम दरसन फल ..... ४। ६; ७। ३०; १०। ११; १२। ७
ममता मल जरि ..... ४। १०; ५। ११; १८। ४६, ६६
मम हृदय भवन..... १६। २२
महादेव अवगुन भवन ..... १८। ६६
मिटी न मनकी वासना..... ४। ३०
मुरदे को हरि ..... १६। ११
मूर्ति मधुर मनोहर ..... ४। ६
मेरे तो गिरधर गोपाल ..... १२। ६
मैं अरु मोर तोर ..... १०। ४१
मैं तो हूँ भगतन का ..... १५। ७; १८। ५७
मैं नर-राची ना लखी ..... १८। ६६
मोरें अधिक दास पर ..... ७। २१
मोरें प्रौढ़ तनय सम ..... १२। ५, २०
य
यह बिनती रघुबीर ..... १८। ६६
यह हमारि अति ..... ३। १६
यहि दरबार दीनको आदर ..... ७। १८
या ब्रजरस की परस ..... १८। ६६
र
रहति न प्रभु चित..... ४। ११; ६। ४४; ७। १५;
९। ३०; १८। ५६, ६६
राम कीन्ह चाहहिँ ..... ९। ३४; १८। ६६
राम मरे तो मैं ..... १६। १
रोम रोम प्रति लागे..... ४। ६; १०। ४२; ११। ७, १५
राम सच्चिदानंद दिनेसा ..... १३। १२
ल
लाभु कि किछु हरि ..... १५। २०
श
शोक उसीका कीजिये ..... २। २७
श्रुति सेतु पालक ..... ४। ८
स
संकर सहज सरूप ..... प्रा.
संसृत मूल सूलप्रद नाना ..... ७। १५
सकल प्रकार भगति..... १८। ४७
सनमुख होइ जीव मोहि.... ७। १५, २६, २८; ९। २९,
३०; १६। ५; १७। २२; १८। ६६
सब कर परम प्रकासक ..... १३। १७
सब जानत प्रभु प्रभुता..... न. नि.
सब ते सो दुर्लभ ..... ७। ३
सब मम प्रिय सब ..... ९। २९; १८। ६६
सबहि मानप्रद आपु अमानी..... १२। १३-१४; १३। ७
सहज प्रकासरूप भगवाना ..... १३। १२
सहज बिरागरूप मनु ..... ४। ६
सातवँ सम मोहि मय ..... ९। २९
साधन धाम मोच्छ ..... १८। ४७
सासति करि पुनि ..... १८। ६४
सीम कि चाँपि सकइ ..... ९। ३१
सुनहु तात माया कृत ..... १४। २२
सुनहु भरत भावी ..... ४। ३
सुनु खगेस नहिं कछु ..... १०। ३४
सुनु मुनि तोहि कहउँ ..... १२। ५
सुनु सुरेस रघुनाथ ..... ४। ८
सुमति कुमति सब केँ ..... ९। ३०; १६। ६; १८। १४
सून बीच दसकंधर ..... १। १९
सेवक सुत पति मातु ..... १८। ६६
सेवक बिषय बिबर्ध ..... १५। २
सेवहिं लखनु सीय ..... ५। १८
सो दससीस स्वान..... १। १९
सोइ अतिसय प्रिय ..... १६। ३
सोइ जानइ जेहि..... ४। ६; ७। २५;
१०। १४; १५। २०
ह
हम भरि जन्म ..... ४। ६
हरि-डर, गुरु-डर ..... १६। १
हरि दुरलभ नहिं जगत में ..... ८। १४
हरि अनंत हरि कथा ..... १०। ४०
हरि से तू जनि हेत कर ..... ८। १४
हेतु रहित जग जुग..... ४। ८; ५। २९;
१२। १३; १८। ६६
है सो सुन्दर है सदा ..... १५। ११
होइहि सोइ जो राम..... १८। ६६