श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें- विषयानुक्रमणिका *
१२७९
सीमा (कालकृत और देशकृत)—१०।४०; ११।१९; १५।३
सुख (दे. दुःख)—
बाहरका और भीतरका सुख—६।७; १२।१३
बाहरके सुख-दुःखमें 'सम' तथा भीतरके सुख-दुःखसे 'रहित' होना—५।३ परि.; ६।७; १२।१८
सुख वस्तुके मनसे निकलनेसे—३।१७, ३९; १५।५ वि., १८।३९ वि., ५७ टि.
सुख पदार्थके सम्बन्ध-विच्छेदसे—३।३९; ५।२१; ६।१७; १०।४१
सबसे अधिक सुख किसको है?—६।२०; ८।१६
सुखीको देखकर प्रसन्न व दुःखीको देखकर दुःखी होना—३।३४; ५।७ वि., १८; ६।३२ परि.; १६।२
सात्विक, राजस व तामस सुख—१८।३७—३९
सुख-दुःख-सम्बन्धी विशेष बात—२।१५ वि., ४७ मा.; १३।२०, २१ परि.
सुषुप्ति —२।१३, ७१ परि.; ३।२८, ३९; ५।३, १२, २१; ७।४; ८।१९ परि.; ९।३० परि.
सुहृद और मित्र —६।९
सुष्टि-रचना —प्रा.; ३।११ परि., २२; ४।१, १३-१४; ५।१४; ७।४—६, ८, ९ परि., १२, १९, २९; ८।३, ४, १७-१८; ९।६—१०, १३, २४; १०।८, ३९ परि.; १३।५, १४, १९; १४।३, ७; १५।१
जीवकृत सुष्टि—७।५ परि.; ५।१४ परि.; ८।१८
बिन्दुज और नादज प्रजा—६।४२; १०।६
सुष्टिमें भिन्नता—७।१० परि.
मनुष्यशरीरकी रचना—१८।७३ मा.
सुष्टिचक्र—३।१४—१६
सेवा —सेवा-सम्बन्धी विशेष बात—३।३४ मा.; ५।७ वि.; १८।४५ वि.
धनके बिना सेवा कैसे होगी?—३।३४ मा.
शरीर-इन्द्रियाँ-मन-बुद्धिकी सेवा—३।९ टि., १३; ६।१
सेवा और प्रेम—१५।२०, अ. सा.
सेवा और विवेक—२।४७
सेवा और सेवावृत्ति—१८।४४
नौकरी, सेवा और पूजा—१८।४५ वि.
सेवा और पूजा—१८।४५ वि., ४६ परि., ६५
देश-समाजकी सेवा—१२।११
सेवा लेनेसे पुण्योका नाश—१६।२
सोमलता —९।२०
स्थूल और सूक्ष्म —१४।१४
स्पृहा —२।७१; ३।३९; १४।१२; १८।४९
स्फुरणा —३।३४; ५।२३ परि.; ६।२, ४, २४, ३५; १३।७; १८।१२
स्मरण —बोधजन्य, सम्बन्धजन्य और क्रियाजन्य—८।७ वि.
अचिन्त्यका स्मरण कैसे करें?—८।९
भगवान्का निरन्तर स्मरण कैसे हो?—८।१४ परि.
स्मृति —२।७१; ३।२८; ८।१४ परि.; १०।३४; १२।१; १५।४, १५; १८।७३
स्मृति और विस्मृति—१२।१, ८; १५।४; १८।७३
विस्मृति कबसे हुई?—१८।७३ मा.
स्मृति और चिन्तन—१५।१५; १८।७३ परि.
क्लिष्ट और अक्लिष्ट स्मृति—१८।७३
स्वरूपकी व अन्तःकरणकी स्मृति—१५।१५; १८।७३
कर्मयोग, ज्ञानयोग तथा भक्तियोगकी स्मृति—१८।७३
स्मृति-सम्बन्धी मार्मिक बात—१८।७३ मा.
'स्व' और 'पर' —३।९ टि., १९, २२, ३५ मा.; ४।१२, १८, १९; ५।१९; ६।४३ परि.; १५।६ परि.; १८।४०, ४८, ६० परि.
स्वभाव —३।३३, ३४; ५।१४; ६।४०; ७।४, २०, २८; ८।४ टि.; ९।८, १२, १३; १४।१५, १८; १६।२, ४, १९, २० वि., २४; १८।१२ वि., ४१, ४२ परि., ४४, ४७, ६०, ६१
आसुरी, राक्षसी और मोहिनी स्वभाव—९।१२
स्वभावको सुधारनेके उपाय—१८।१२ वि., ६० वि.
स्वभाव-भेदका कारण—१६।२० वि.
स्व-स्वभाव और पर-स्वभाव—१८।६० परि.
स्वभावकी परवशता (प्रबलता)—१८।६० वि.
स्वयं —अहम्से परे स्वरूपको कैसे जानें?—३।२८
स्वयंकी स्वीकृति—९।३० परि.; १३।१५ परि.
स्वयंका पुरुषार्थ—१५।७ परि.
स्वयंका और बुद्धिका निश्चय—९।३०; १२।८
स्वयंमें परमात्माको देखना—४।३८, ३९; १३।२४; १५।४, ११
स्वयं सदा ज्यों-का-त्यों रहता है—१३।२७ परि., ३२ परि.
स्वाध्याय —४।२८; १६।१; १७।१५
स्वाभाविक और अस्वाभाविक —७।१३
ह
हिंसा —इक्यासी प्रकारकी हिंसा—१३।७
अपने विचारकी हिंसा—१३।७
भोग भोगनेसे हिंसा—३।१०-११ मा., १६; १६।२; १८।२७
स्वार्थ, क्रोध, लोभ और मोहको लेकर हिंसा—१७।१४
यज्ञमें पशु-हिंसाका फल—१७।२२ वि.
हृदय —१५।१५
हृदयमें परमात्माका अनुभव करनेका उपाय—१३।१७