श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 1273, कुल 1299 में से
संदर्भ में पढ़ें१२७२
- साधक-संजीवनी-कोश *
पूर्वजन्मकी याद क्यों नहीं रहती ?—२।१३; ४।५; १०।३४
पूर्वजन्मका ज्ञान—४।५
पृथ्वी —पृथ्वीपर जल और स्थलका कुल भाग—१५।१२
पृथ्वीका अनाजमें रूपान्तर—१३।३० टि.
प्रकाश —प्रकाश और प्रकाश्य—२।१२; ५।८-९; ६।१; १३।१७, ३३; १५।१५; १८।१६ टि., २० मा.
प्रकाश पहले दीखता है, वस्तु बादमें—१५।१५ वि.
भौतिक प्रकाश और दिव्य प्रकाश—११।१२
प्रकृति —प्रकृति कभी अक्रिय नहीं होती—३।५ वि., परि., १८, २७; ४।१८; ५।८-९; १३।२९
प्रकृतिके कार्य—१३।१४, १९
प्रकृतिका कार्य स्वतः ह्लासकी तरफ जाता है—९।७
प्रकृति और पुरुष—३।२८; १३।१९-२३, २९ परि., ३१; १८।१२ वि.
प्रकृति एवं संसार—४।२४
प्रकृतिमें ज्ञान नहीं—१०।४१ परि., टि.
प्रकृतिको अनादि कहनेका कारण—१३।२० परि.
प्राकृतिक प्रकोप (अकाल, भूकम्प, महामारी आदि)—का कारण—३।११, १२ वि., १३
प्रकृतिमें भिन्नता—७।१० परि.
प्रकृतिके सम्बन्धसे शक्ति क्षीण होना—१०।७ वि.
प्रणव (औंकार)—७।८; ८।१३; ९।१७; १०।२५; १७।२४
प्रमाण (प्रत्यक्ष, अनुमान आदि)—२।१८; ११।१७; १८।७३
प्रमाद —१४।८, १३
आलस्य और प्रमाद—२।४७; ४।२१; १४।८; १८।३९
अक्रिय प्रमाद और सक्रिय प्रमाद—१४।८; १८।३९
प्रवृत्ति और निवृत्ति ('करना' और 'न करना')—३।१८ मा., १९ मा., २७; ४।१ वि., १५, १६ मा., १८, २१; ५।४ परि., १३ परि.; ७।२७; १६।७; १८।३०, ५९
प्रवृत्ति और आरम्भ—४।१९ टि.; १४।१२
प्रवृत्तिमार्ग और निवृत्तिमार्ग—४।१६, २९
प्रागभाव और प्रध्वंसभाव —९।६
प्राप्त और प्रतीति —३।१९ मा.
प्राण और अपान —४।२९; ५।२७
प्राण, अपान आदि दस प्राणवायु—१५।१४ टि.
प्राणशक्ति —७।९; १०।९; १३।६
प्राणशक्ति और इच्छाशक्ति—१५।८
प्राणायाम —४।२७, २९-३०; ५।२७; ८।१०, १४; १८।३३
प्राणी—जरायुज, उद्विज्ज, अण्डज और स्वेदज—३।१४;
१०।३९ परि., १४।४
स्थावर और जंगम—१०।३९; १३।२६
प्रायश्चित्त —७।२६; १६।१; १७।२२ वि.; १८।२-३, १२, ६६ परि.
प्रारब्ध —१।४६; २।११, १५ परि.; ३।३७ परि., ४।३७; ५।१४; ६।७; ७।१६ टि.; ११।३३; १६।१, ११, २० वि.; १८।१२ वि.
प्रारब्ध और पुरुषार्थ—२।१५ परि., ४७; १६।४; १८।१२ वि.
प्रारब्ध और पुरुषार्थ-सम्बन्धी मामिक बात—२।४७ मा.
प्रारब्ध और भगवत्कृपा—१८।१२ वि.
प्रारब्धजन्य एवं कुपथ्यजन्य रोग—१८।१२ वि.
क्या ज्ञानिका प्रारब्ध रहता है ?—१८।१२ वि.
प्रार्थना —७।२६; ९।१४, ३४; १०।११ वि.; ११।४० परि.; १२।२०; १३।१३; १५।७ वि.; १६।१, २, ५, २२ परि.; १८।६६ परि.
पुकारकी महिमा—७।१५ वि.; ९।३२; ११।५३; १३।१३; १८।६६ वि.
'हे नाथ!' पुकार—१६।२, २२
प्रेम —प्रतिक्षण वर्धमान प्रेम—५।२१; ६।४७; ७।४, १७, १८, १९ परि.; ८।१५ वि.; ९।३४ वि.; १०।९; १२।१८-१९ वि.; १५।४, ६ परि., १० मा.; १८।५४, ५५ वि., ५७ वि.
प्रेम और काम—३।४२ मा., ४३ परि.; १८।५७ वि.
प्रेम और ज्ञान—७।१८; १२।२ परि.; १३।२३ परि.
प्रेम और श्रद्धा—१२।२, ८ परि.; १७।३ मा.
प्रेम और सेवा—१५।२० अ. सा.
विरह और मिलन—४।६
कौटुम्बिक स्नेह और भगवत्प्रेम—१।२५
कर्मयोग, ज्ञानयोग व भक्तियोगमें भगवत्प्रेम—१८।५५ वि.
प्रेम-सम्बन्धी विशेष बात—८।१५ वि.; १२।२ परि.; १८।५५ वि., ५७ वि.
दास्य, सख्य, वात्सल्य व माधुर्य रति—१८।५७ वि.
माधुर्य रतिका तात्पर्य—१८।५७ टि.
प्रेमकी दो अवस्थाएँ—१८।५५ परि.
भगवान्को माने बिना मुक्ति तो हो सकती है, पर प्रेमकी प्राप्ति नहीं हो सकती—७।२९; ८।१५ वि.
ब
बल —१।१०; ७।११
बाजा —(खाल, तार, फूंक व ताल)—१८।१२
बुराईरहित होनेके उपाय —५।३ मा.; ६।९ वि.
ब्रह्म ईश्वरका एक अंश (अंग) है —७।३० परि.;