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सर्वकोश
श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

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  • विषयानुक्रमणिका *

१२६९

टि.; १७।१ टि.
सात्त्विकताका तात्पर्य—१७।११
गुणोंकी तारतम्यतासे चार वर्ण—१८।४१ वि.
गुरु—२।७, २९; ४।३, ३४; ६।५ परि.; ७।५ टि., २१ परि.; ९।२६; १०।४१ वि.; १२।५ वि.; १३।७; १७।१४; १८।६४ परि.
गुरु-सम्बन्धी विशेष बात—१३।७
गुरु और राजा—१०।४१ वि.
गुरुकी आवश्यकता ज्ञानमार्गमें—१३।७
गुरु कैसा हो?—१३।७
भगवान् सबके आदिगुरु हैं—४।१
गुह्य, गुह्यतर, गुह्यतम और परमगुह्य विषय—९।१ परि.; १८।६२, ६३ टि.
च
चन्द्रलोक और चन्द्रमण्डल—८।२५; १५।१३
चित्तकी पाँच अवस्थाएँ (मूह, क्षिप्त, विक्षिप्त, एकाग्र और निरुद्ध)—६।१८ टि., ३६; १३।२४
चिन्ता—पारमार्थिक और सांसारिक चिन्ता—१६।११
चिन्तासे हानि—२।११
चिरंजीवी—१।८ टि.
च्युत साधन—६।२५ परि.; १३।८
चेतन और जड़—७।२० टि.
चेतनता और जड़ता—१६।५ परि.
चौरासी लाख योनियों—३।१०-११ परि.; ७।२८ वि.; १०।३९ परि.; १४।४ परि.
ज
जन्म-मरणका कारण—२।२२ वि., ४०; ५।१२; ७।२९; ८।१४, १९, २७; ९।३; १३।२१, २६ परि., २८; १५।१ परि., २, ५; १६।५ मा.; १८।१६ टि., ५५ वि., ५८, ७४
जन्म-मरण कबसे शुरू हुआ?—प्रा.; ७।१३
शास्त्रकी दृष्टिसे 'अज्ञान' और साधनकी दृष्टिसे 'राग' ही जन्म-मरणका कारण—३।२८; ५।१०; ७।२७
जाग्रत्-स्वप्न-सुषुप्ति—५।३; १३।१; १८।१२ वि.
जाग्रत्-सुषुप्ति—१८।१२ टि. ३९
जाग्रत्-सुषुप्ति और समाधि—१८।१२ टि.
जाति—४।१४ परि.; ७।५ परि., १० परि.
जाति जन्मसे मानी जाय या कर्मसे?—१८।४४
भक्तोंमें जातिभेद नहीं—१८।४४, ६६ वि.
ज्ञानना और मानना—प्रा.; ३।३, ३० वि.; ५।२९; ७।२, १२, १९; ८।४ वि.; १०।३ परि., ७ टि.; १३।१५; १५।१९
मान्यतासे मान्यता मिटती है—२।१४ टि.; ५।२१
जिज्ञासा—५।३ परि.; ६।४४; ७।४-५, १६; १५।७ परि.;

१८।१, ७०
भोगेच्छा और जिज्ञासा—७।४-५
कामना और जिज्ञासा—७।१६ मा.
जिज्ञासु—जिज्ञासु और मुमुक्षु—७।१६ परि.
भावप्रधान और विवेकप्रधान जिज्ञासु—१३।१०
जीव—जीव ईश्वरका अंश है, ब्रह्मका नहीं—१५।७ परि.
जीव भगवान्का अंश है, कार्य नहीं—७।६
ज्ञान—५।१५-१६; १०।४, १२-१३ परि., ३८, ४१ परि.; १३।२, १७; १८।१८, १९
अपने ज्ञानका अनादर—२।२२ टि.
ज्ञानके आठ अंतरंग साधन—४।३३
ज्ञानके तीन अधिकारी—४।३४
ज्ञान और विज्ञान—३।४१; ६।८; ७।२, ६, ३० परि.; ९।१, ४-५ परि., ९।अ. सा.; १८।४२
ज्ञान और विज्ञान-सम्बन्धी विशेष बात—७।२ वि.; ९।१ वि., २
आत्मज्ञान और परमात्मज्ञान—४।३५ परि., ३८ परि.; ६।३० परि., ३४ परि.; ९।१ परि.; १०।३२
सात्त्विक ज्ञान और तत्त्वज्ञान—१४।६ परि.; १८।२०
आवृत और अनावृत ज्ञान—८।२३
इन्द्रियोंका ज्ञान और बुद्धिका ज्ञान—५।२८; १३।१७
ज्ञान दोषी नहीं होता—२।१४; १२।१३; १३।६ वि.; १४।२४; १८।१२ वि.
नफा-नुकसान आदिमें फर्क है, ज्ञानमें कोई फर्क नहीं—१३।८ टि.; १५।९
साधन-ज्ञान और साध्य-ज्ञान—१३।१०
तत्त्वज्ञान होनेके लक्षण—१३।६ वि., ७
क्या ज्ञानयोगका साधक भक्ति भी करता है?—१३।१०
ज्ञानकी भूमिकाएँ—१४।२६
संसारका ज्ञान संसारसे अलग होनेपर—२।६९ परि.; ३।२८ परि., ४३ मा.; ४।१८; ७।१३, २७ परि.; ९।३४ वि.; १०।३; १३।२; १५।३; १८।३१
त
तप—३।३५; ४।२८; १०।५; १६।१; १७।१७—१९; १८।१५, ४२, ६७
ज्ञानतप—४।१०
शारीरिक तप—१७।१४
वाणी-सम्बन्धी तप—१७।१५
मानसिक तप—१७।१६
आसुरी तप—१७।७
तादात्म्य—३।२७ परि., ४२-४३ मा.; ७।४-५, २९; ९।३२ मा.; १३।६, ६, २०, २१ परि., २८, ३३ परि.; १४।२०; १५।३; १६।५ मा.; १८।११, १२ वि.
तादात्म्य-ममता-कामना—३।३७ वि.; ९।१०; १४।५;