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सर्वकोश
सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ४

सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ४

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 4

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished280 पृष्ठ

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भूमिका

वर्षफल द्वारा वर्षभर का शुभाशुभ फळ और उस फल का समय निकाला जाता हैं। जातक की जन्म-पत्री से जीवन भर का फळ प्रगट होता है। परन्तु प्रतिवर्ष का 'सूक्ष्म फळ निकालने के किए वर्षफछ बनाया जाता है। वर्षफल बनाने का गणित सरळ कर उदाहरण देकर समझाया गया है। वर्षफल बनाने के लिए जन्म की तिथि मास नक्षत्र सम्वत्‌ शक आदि के अतिरिक्त इऽडकाळ और जन्म का इष्ट कालीन सूर्य एवं लग्न कुण्डली की आवद्य- कता पड़ जाती है।

जन्म का इष्ट कालीन सूर्यं अगले वर्ष जिस समय आता है उसे निकालने को वर्षप्रवेश साधन कहते है । इससे अगने वर्ष आरम्भ होने का ठीक समय तिथि दिन एवं इष्टकाल प्रकट होता है और इष्टकाल की कुंडली वनाई जाती है। उसी को वर्ष- वेश कुण्डो कहते हैं जिपके निकालने की कई रीतियां और सारिणी भी दी है । | जिप प्रकार वर्षंमर का फल जानने को वर्ष प्रवेश के समय की वर्ष कुण्डली बनाई जाती है उप्ती प्रकार प्रसेक मास का फल जानने को मास प्रवेश का समय “निकालफर प्रत्येक मास की मातत प्रवेश कुण्डली बनाई जाती है, जिसको निकालने के लिए आगे गणित और सारिणी भी दी है । इसी प्रकार प्रत्येक दिन का फक जानने को दिन प्रवेश का समय निकाल कर "प्रत्येक दिन प्रवेश के इ्टकाल पर से प्रत्येक दिन की दिन प्रवेश कुंडली भी बनाई जाती है ।

वर्ष प्रवेश की कुण्डली वन जाने पर वर्षप्रवेश् के इष्टकाळ का ग्रह स्पष्ट और “भाव स्पष्ट किया जाता है। इसी प्रकार मास प्रवेश के इष्टकाल के भी ग्रह स्पष्ट किये जाते हैं ।

जन्म छान स्वामी और वर्ष छत स्वामी जान लेने के उपरांत मुन्थापति, “त्रिराशिपति और समयपति निझाले जाते हैं। इन पांचों को लघु पंचाधिकारी या “लथुपंचवर्गी कहते हैं । इन पांचों में से चुनना पड़ता है कि कौन वर्षेश् होगा । इस कारण इन ग्रहों की दृष्टि निकाल नी पड़ती है। यदि लग्न पर कई ग्रहों की दृष्टि -होती है तो उनमें से बलवान ग्रह वर्षेश होता है और तात्कालिक मंत्री का भी “विचार होता है ।

ग्रहों का वल जानने को वृहत्पञ्व वर्गी बळ चक्र बनाना पड़ता है। वर्ष प्रवेश के "समय स्पष्ट ग्रह हो उसी पर से ग्रहों का पञ्चवर्गी बल भी निकालना पड़ता है और ग्रहों का द्वादश वर्गी वळ भी निकाला जाता है। ग्रहों का विषवा बळ जानने को हषं बकर बताया जाता है और ग्रहों का वेत्र जानने को त्रिपताका चक्र बनाया जाता है ।