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सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ४

सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ४

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 4

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished280 पृष्ठ

पृष्ठ 119, कुल 280 में से

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पृष्ठ 119

अध्याय १४

पत्यांशी दशा साधन

इसमें सूर्यं से शनि तक ७ ग्रह और लग्न मिलाकर ८ ग्रह लिए जाते हैं ।

पत्यांशी दशासाधन की रीति

(१) सातों ग्रह और लग्न के स्पष्ट का एक चक्र बनाना। यह ग्रह स्पष्ट और रूरन का चक्र हुआ।

(र) आठों ग्रह की राशि को छोड़कर केवल अंश कलादि लेकर दुसरे चक्र में रखना । यह अंश चक्र हुआ ।

(३) फिर दुसरे चक्र से देखना किमका अल्प मंदा है ।

जिसका सबसे अल्प अंश हो उसे सबसे पहिले ऊपर रखना उसके बाद क्रमानुसार

बड़े अंश बाले को रखना । इस प्रकार सबसे अधिक अंश वाला ग्रह अंत में रहेगा । ` तीसरा इसे हीनांश्च चक्र कहेंगे ।

यदि हीनांश चक्र में २ ग्रह समान अंश कलादि में हों तो (अ) उनमें से सबसे अधिक बलवान्‌ ग्रह सबसे पहिले रहेगा (व) यदि उनका बल भी समान हो तो अल्प गति वाला पहिले लेना ।

(४) होनांश चक्र पर से पत्यांश वनाकर चक्र ४ में रखा जाता है ।

(५) पत्यांश चक्र से दशा स्पष्ट लेकर पाँचवें चक्र में रखते हैं ।

(६) फिर दशा की अंतदंशा निकाल कर. प्रथम चक्र में रखते हैं । इन सबके

बनाने की रीति आगे दी है ।

हीनांश से पत्यांश बनाना

(१) हीनांश्च चक्र ३ में सबसे पहिले जो ग्रह या लग्न हो और उससे जितने अंश

कलादि हों उसे पहिले पत्यांश चक्र ४ में आरंभ में लिख लो । अर्थात्‌ सव में अल्प

अंश का ग्रह या लग्न एक कोई आरम्भ में लिखा जायगा ।

(२) फिर उससे कुछ वडा अंश वाला जो उसके नीचे दिया हो उसका और

आरम्भ में दिये हुए ग्रह का अंतर निकाल कर नीचे रखो अर्थात्‌ यह पहिले और

दुसरे ग्रह का अन्तर हुआ । फिर इसी प्रकार दुसरे. और तीसरे ग्रह का अन्तर

निकाल कर उसके नीचे लिख दो । ` पश्चात्‌ तीसरे और चोथे ग्रह का अन्तर फिर

चौथे और पाँचवें ग्रह का, इसीप्रकार आठौं ग्रह का अन्तर निकाल कर चक्र ४ पत्यांश

चक्र में एक दुसरे के नीचे रखते जाना । यह पत्याँश चक्र बन गया।

(३) पश्चात्‌ सबका योग कर नीचे लिख देना । यह पत्यांश योग हुआ । ध्यान

रहे कि चक्र ३ में दिये हीनांश चक्र के अंतिम ग्रह के अंश कलादि के समान यह योग

आता है।