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सर्वकोश
सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ३ (खण्ड १)

सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ३ (खण्ड १)

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 3 (Part 1)

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished418 पृष्ठ

पृष्ठ 202, कुल 418 में से

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पृष्ठ 202

१८६ : ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

प्रदन में सफलता--दशमेश से सफलता निश्चित करना । यदि दशम या दशमेश शुभ

या शनि युक्त हो तो सफलता होगी ।

कुछ शब्दों का स्पष्टीकरण

यद्यपि इनमें से कुछ बातों का स्पष्टीकरण पहिले ही कर दिया गया है परन्तु यहाँ

ओर भी स्पष्ट रूप से समझाया जाता है ।

(१) ग्रहों का योग या दृष्टि-किन्ही ग्रहों के साथ हो या किन्ही ग्रहों की दृष्टि हो ।

शुभ योग दृषिट--शुभग्रह का ara हो या शुभग्रह की दृष्टि हो।

पाप योग दृष्टि--पापग्रह का साथ हो या पापग्रह की दृष्टि हो ।

(२) ग्रहयोग (एकत्र) --किसी एक राशि पर ग्रहों का एकत्र होना । कभी-कभी एक

राशि में ८ ग्रह तक एकत्र हो जाते हैं परन्तु इनका फल विचारने के लिये उन ग्रहों का

अंशों के विचार से पास-पास भी होना आवश्यक है । यदि यह योग दीप्तांश के भीतर

होगा तो उसका अच्छा या बुरा प्रभाव जो वह ग्रह उत्पन्न करता हो, अनुभव में आवेगा,

यदि उन दोनों ग्रहों के बीच अधिक अंशों का अन्तर पड़ जाय तो उस योग का प्रभाव

चट जायगा । ग्रहों के दीप्तांश ये हैं--

—— ग्रह | सूर्य चन्द्र | मंगल | बुध | गुरु | शुक्र | पानि

दीप्तांश १५ अंश १२ ८ ७ ९ | ७ | ९ अंश

मान,लो सूर्य मंगल एक राशि में Š उन दोनों के ग्रह स्पष्ट का अन्तर करने से वह अन्तर

८ अंश या उससे अल्प है तो उस योग का पूरा अच्छा या बुरा प्रभाव प्रगट होगा | यह्‌

अन्तर बढ़ कर ज्यों-ज्यों अत्रिक होता जायगा त्यों-त्यो प्रभाव घटता जायगा । मिथुन

राशि में बुध २० पर है और मिथुन में गुरु २२० पर है तो यहाँ दोनों का अन्तर २७”

का हो जाने से बुध और गुरु के एकत्र हो जाने का जो फल बताया गया है वह फल नहीं

होगा चाहे ऊपरी दृष्टि से देखने में वह भले ही एक ही राशि में हों ।

(३) दृष्टि के विषय में पहिले समझा चुके हैँ इसी प्रकार दृष्टि भी दीप्तांश के

भीतर होनी चाहिये ।

(४) बली ग्रह-गणित से ग्रह का पड्बल निकाला जाता है उससे प्रगट हो जाता है

कि फोन ग्रह सबसे अधिक बली है वह ग्रद बली है या निर्बल । साधारण प्रकार से इस

तरह विचार करते हैं कि एह का कोई अच्छा साथी हो या शुभग्रह का योग या दृष्टि हो,

उच्च मूलत्रिकोण आदि स्थान में हो मित्रगृही हो, नवांश में उच्च या मित्र के नवांश में

हो इत्यादि ।

(५) मृत्यु का अर्थ--फल विचारन में जहां-जहाँ मृत्यु शब्द आता है वहाँ उसका

अर्थ परिस्थिति के अनुसार विचार करना । मृत्यु का व्यापक अर्थ ८ प्रकार से मरण

बताया है १ व्यथा, २ दुःख, ३ भय, ४ लज्जा, ५ रोग, ६ शोक, ७ अपमान, ८ मरण ।

यहाँ परिस्थिति और क्रूरता पर बिच।र कर मृत्यु शब्द का अर्थ लगाना ।