सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २
Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 2
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
इस ग्रन्थ के बारे में
बी. एल. ठाकुर की 'सचित्र ज्योतिष शिक्षा' का यह भाग 'फलित खण्ड' का दूसरा भाग है। पहले खण्ड में ज्योतिष की बुनियाद रखने के बाद लेखक यहाँ फल-कथन की तकनीकों पर आते हैं, यानी कुण्डली में ग्रहों की स्थिति और सम्बन्धों से जीवन के परिणाम कैसे पढ़े जाएँ।
विषय-सूची के अनुसार इसके अध्याय इस क्रम में हैं:
- ग्रहों की दृष्टि का फल
- एक राशि में अनेक ग्रहों के होने का फल
- योग विचार
- षड्वर्ग विचार
- अष्टकवर्ग
हर विषय को उदाहरण-कुण्डलियों और सारणियों के साथ समझाया गया है, जो इस श्रृंखला की पहचान है। षड्वर्ग और अष्टकवर्ग जैसे विषय, जो प्राचीन ग्रन्थों में कठिन संक्षिप्त सूत्रों में मिलते हैं, यहाँ चरण-दर-चरण गणना के साथ खोले गए हैं।
मोतीलाल बनारसीदास ने इसका द्वितीय संशोधित और परिवर्धित संस्करण १९८३ में वाराणसी से निकाला और दिल्ली से १९९१ और १९९५ में इसे फिर छापा। ४५४ पृष्ठों का यह खण्ड ज्योतिष के उन विद्यार्थियों के लिए है जो मूल बातें सीख चुके हैं और अब व्यवस्थित ढंग से कुण्डली-विश्लेषण सीखना चाहते हैं।
४४२ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
होता है । (जा. पारि.)
२०-प्रवज्या प्रद ग्रह सूये शनि मंगल से युक्त हो तो धन पुत्र स्त्री से रहित सन्यासी हो ।
२१-शुभ नवांश में सूये हो और वह उच्च के अन्त भाग में स्थित ग्रह को देखता
हो तो वह युवा या बालावस्था में संन्यासी हो । (जा. पारि.)
२२-शुक्र और बुध बलहीन होकर लग्न को देखें तो दरिद्र हो । (जा. पारि.)
२३-कोई ग्रह उच्च राश्यंश में युक्त होकर चन्द्र को देखता हो तो भिक्षुक (संन्यासी) हो । ८
२४-बहुत ग्रह एक स्थान में होकर लग्न को देखें तो दीक्षित हो।
२५-जहाँ चन्द्र हो उस राशि के स्वामी को शनि या लग्नेश देखते हों तो दीक्षित
हो (प्रवज्या हों) ।
२६-यदि चन्द्रमा मंगल की राशि में हो शनि के द्रेष्काण में हो शनि उसे देखता . हो तो सन्यासी हो । :
२७-तवम भाव में चन्द्र हो उसे कोई ग्रह न देखता हो तो राजयोग में उत्पन्न
होने पर भी दीक्षित राजा हो (जा० पारि०) 1 अन्य विचार
२८-एक राशि में इस प्रकार ग्रह हो ।
सुर्य, चन्द्र, गुरु, बुध ) तो बल्कल धारी फल भोजी सन्यासी हो । या मगल, बुध, शुक्र शनि ? या चन्द्र गुरु शुक्र शनि ]
२९-चन्द्र क्षीण हो प्रवज्या योग हो लग्नेश चन्द्र को देखे तो जातक दुःखी तपस्वी, शोक तप्त, धन जन रहित, कष्ट से भोजन पाने वाला हो ।
३०-प्रवज्या योग में राजयोग होवे तो बुरा प्रभाव घट जायगा वह दीक्षित साधु शील राजा बना रहेगा जिसे सव नमन करेंगे । ३१-यदि ४ ग्रह जिनमें एक दशमेश भी हो केन्द्र या त्रिकोण में हो या ३ बल- चान् ग्रह अच्छे घर में पड़ें हो तो वह सिद्ध सन्यासी होगा । ३२-भ्रवज्या कारक ग्रहों में अधिक शुभ ग्रह हों और अच्छे घर में हों तो उसका सव लोग मान करेगे। यदि ऐसा न हो तो उसका कोई मान न करेंगे । ३३-जव दशमेश ४ और ग्रहों के साथ केन्द्र या त्रिकोण में हो तो वह मुक्ति प्राप्त करेगा ।
३४-यदि राशि का अन्त उदय हो रहा हो और उसका स्वामी शुभ ग्रह हो गुरु कैन्द्र या त्रिकोण में हो तो भी मुक्ति प्राप्त करेगा । ३५-अवज्या योगों में शुभ ग्रहों से युक्त या दृष्ट न हो तो संन्यास लेने पर भंगहो जावे। ३६-अवज्या योग में ग्रह युद्ध में पराजित ग्रह की भी प्रवज्या भंग हो जायगी अर्थात् वह फकीरी लेकर उसे छोड देगा । जितने ग्रह पराजित हैं उन सब की प्रवज्या छुटती जायगी केत्रल जीते हुए की प्रवज्या रहेगी ।
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This image shows a blank, aged, cream-colored page, likely an endpaper or flyleaf from an old book. The paper has a slightly textured appearance with some minor discoloration and small brown spots, characteristic of old paper. A small, bright yellow circular mark is visible on the right edge, near the top. The left edge of the page shows some wear and discoloration, suggesting it was part of a bound volume.
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