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सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २

सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 2

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

पृष्ठ 206, कुल 454 में से

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पृष्ठ 206

१९६ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

नक्षत्र से लेकर जन्म नक्षत्र तक गिन कर विचार करना । जहाँ जन्म नक्षत्र पड़े उसके

अनुसार फल विचारना ।

ज्वर आने पर, सपं आदि विष युक्त जीवों के काटने पर, विवाद, विग्रह और रण

में इस चक्र में शुभाशुभ का विचार होता है ।

इसमें ९ नक्षत्र ऊपर, ९ नक्षत्र तिरछे, ९ नक्षात्र नीचे सर्पाकार लिखना । इसमें

मध्य के अर्थात्‌ बीच में आरम्भ के ३ नक्षत्र कालमुख हैं कोण स्थित जो चन्द्राधिष्ठित

नक्षत्र होते हैं वे दोनों द्रेष्ट्रा ( दाढ ) हैं ।

जन्म नक्षत्र मुख या द्रष्टा में पड़े तो=मृत्यु जन्म नक्षत्र के योग से ४० घड़ी

इनको छोड़ दूसरे स्थानों में पड़े तो -शुभ का वेध होता है।

यम द्रष्ट्रा चक्र ( वर्तमान चन्द्र नक्षत्र से आरम्भ करना )

आदि अश्वि० आर्द्रा" पुन० उ०फा० हस्त ज्ये० मूल० शत० पू०भा०

मध्य भरणी मृग० पुष्य प्‌०फा० चित्रा अनु० पृ०षा० धनि० उ०भा०

अन्त कतिका रोहि० अश्ले० मघा स्वा० वि० उ०षा० श्रवण रेवती

त्रिनाड़ी चक्र

यह भी सर्प के आकार फां होता है आर्द्रा से मृगशिर तक २७ नक्षत्र इसमें रहते

हैं। प्रथम कोष्ठ में आर्द्रा, मध्य में मूल, अन्त कोष्ठ में मुगशिर आ जाता है । इसमें

दैनिक चन्द्र नक्षत्र, सूर्य नक्षत्र और जन्म नक्षत्र लिखा जाता है | इससे विवाद, संग्राम

रोग आदि का विचार होता है ।

(१) सूर्य चन्द्र और जन्म नक्षत्र एक नाड़ी ( नक्षत्र ) में हो तो-मृत्यु होती है।

इस दिन विवाद विग्रह संग्राम आदि नहीं करना ।

(२) जन्म नक्षत्र और सूर्य नक्षत्र एक नाडी में हो तो उस नक्षत्र में सूर्य रहने तक रोगी को पीड़ा रहे ।

(३) जन्म नक्षत्र और वर्तमान चन्द्र नक्षत्र एक नाड़ी में हो तो रोगी को ८ पहर

की पीड़ा रहे ।

(४) जन्म नक्षत्र चंद्र और सूर्य भिन्न-भिन्न नाड़ी में हो तो निरोगता रहे । त्रिनाड़ी चक्र

आर्द्रा पू०्फा० उ०फा० अनु० ज्ये० घनि० शत० भरणी कृतिका . पुन० मघा हस्त विशा० मूल श्रवण पू०भा० अश्वि० रोहि० पुष्य अश्ले० चित्रा स्वा पू०षा० उ०्घा० उ०भा० रेवती मृग०