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सचित्र ज्योतिष शिक्षा (प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड) भाग १

सचित्र ज्योतिष शिक्षा (प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड) भाग १

Sachitra Jyotisha Shiksha (Prarambhika Gyan Khand) Vol 1

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished288 पृष्ठ

पृष्ठ 172, कुल 288 में से

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१४४ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड

अपवाद— वक्की ग्रह का दूसरे ग्रहों के साथ योग हो सकता है। हर्षल जब वक्की होता है तब उसका योग किसी भी ग्रह के साथ या चन्द्र के साथ भी हो सकता है।

पाश्वत्या मत्त से ग्रहों के दीप्तांश।

( १ ) बु. गु. शु. श. ह.—जब संयोगी हों=६°, वियोगी में ८° दीप्तांश। मान लो शुक्र शनि का युति योग है। यह योग संयोगी है, जब शुक्र शनि से ६° अन्तर पर होगा तो उस दृष्टि का प्रभाव होगा और दोनों का योग होकर शुक्र ८° चला जायगा तब तक इसका प्रभाव रहेगा। इसी प्रकार सब ग्रहों का विचारना।

( २ ) सूर्य का दीप्तांश अधिक है, संयोगी में १२° और वियोगी में १७° है। ये दीप्तांश केवल युतियोग, द्विराशि अन्तर योग, त्रिकोण योग और प्रतियोग में विचारना।

( ३ ) छोटे-छोटे दृष्टि योगों के दीप्तांश।

( १ ) एक राशि अन्तरयोग, ७२° अन्तरयोग, १४४° अन्तरयोग में संयोगी में २° और वियोगी में ३°

( २ ) साढ़े केन्द्रयोग, साढ़े चतुष्टयराश्यंतरयोग में, संयोगी ३°, वियोगी ४°

( ३ ) सूर्य और चन्द्र के दृष्टि योग में इन दीप्तांशों से १° और अधिक लेना।

( ४ ) सम क्रान्तियोग में २° से अधिक नहीं लेना। मान लो मंगल की क्रान्ति १३° उत्तर और शनि की ११° दक्षिण है तो इन दोनों का सम क्रान्तियोग हुआ। इसी प्रकार भाव के भी दीप्तांश होते हैं।