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रुद्रयामल तन्त्र (उत्तर तन्त्र - हिन्दी व्याख्या सहित)

Rudrayamala Tantra (Uttara Tantra) with Hindi Commentary

भगवान भैरव / पं. रामचरण शर्मा द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished68 पृष्ठ

सूत्रेण बंधयेद्धस्ते तदा वादे जयो भवेत् ॥ ३८ ॥

१० रुद्रयामलतन्त्रम्
कात्तिकस्य चतुर्दश्यां कृष्णपक्षे समानयेत् ।।
नीलवृक्षस्य मूलं च स्मशानाच्च विशेषतः ।।
सूत्रेण बंधयेद्धस्ते तदा वादे जयो भवेत् ॥ ३८ ॥
कार्तिककृष्णपक्षकी चतुर्दशीकोलीलकी जड़ स्मशानसे लाकर सूतमें
कसके हाथमें बांधो तो सब वादोंमें जय पावे ।।३८।।
श्वेतगुंजकमूलं च मुखे निक्षिप्य यत्नतः ।।
तदाशत्रोर्मुखं चैवनिरुंध्यान्नात्र संशयः ।। ३९ ।।
सपेद गुंजाकी जड़ लेकर मुखमें रखे और मंत्र पढ़े तो शत्रु का मुख रुक
जाय इसमें सन्देह नहीं है ।।३९।।
मंत्रः । ॐ ह्रीं रक्तचामुंडे कुरु कुरु स्वाहा ।
हस्तर्क्षे छछूदरं च चूर्णं कृत्वा विधानतः ।।
अंगेषु मर्दयेच्चैव तदा भग्नाश्च हस्तिपाः ।। ४० ।।
मंत्र पढ़ हस्तनक्षत्रमे छछूंदर पकड़कर चूर्ण कर विधानसे अंगोंमें मर्दन
करे तौ हाथीवाले भाग जांय ।।४०।।
तिलपुष्पं चूर्णसमं कृत्वा तिलकमुत्तमम् ।।
हस्तिपाश्च पलायंते सिंहत्रस्ता वने यथा ॥ ४१ ॥
तिलके फूल और छछूंदरका चूर्ण बराबर ले तिलक करे तौ हाथीवाले
भाग जांय ।।४१।।
हस्तर्क्षे च निगृह्णाति मूलं कीकवचस्य च ।।
हस्ते बध्नाति तां चापि शिरसि च विशेषतः ।।
तदा युद्धे भयं नैव न चापि शस्त्रघातनम् ॥ ४२ ॥

हिन्दीटीकासहितम् ११
हस्तनक्षत्रमें कीकवचकी जड़ ले हाथमें वा शिरमें बांधे तौ युद्धमें डर
न लगे और शस्त्र न लगे ॥४२॥
श्वेतकंटकिमूलं च हस्ते गृह्य च बंधयेत् ॥
संदर्शनात्पलायंते व्याघ्राः सर्वे दशो दिशः ॥ ४३ ॥
सपेद कटइयाकी जड ले हस्तनक्षत्रमें हाथमें बांधे तौ व्याघ्र देखके
दशों दिशाको भाग जाय ॥४३॥
मंत्रः । गौरीकांतै महादेवकेन जाई अहो
बांधिजै हमारा कुत्ता हा आइ यह भूमि हमें
छोडि दीजै तुरिय वर घर कीजै मेरे पास
आवौ तौ हनुमतकी आन ॥
इस व्याघ्र बांधनेवाले मंत्रको पढ़े ।
पुनर्वशीकरणम् ।
पुष्ये धत्तूरपुष्पं च मूले मूलं च गृह्यते ॥
गोरोचनं च कर्पूरं समभागं समानयेत् ॥ ४४ ॥
पुष्य नक्षत्रमें धतूरेका पुष्प ले तथा मूल नक्षत्रमें जड़ ले और गोरोचन
कपूर समभागले ॥४४॥
तिलकं कृत्य च भवेत्स्त्रीनामकथनेन च ॥
वशीभूता तदा याता महादेवप्रसादतः ॥ ४५ ॥
तिलक कर जिस स्त्रीका नाम ले वह महादेवके प्रसादके वश्य होय ॥४५॥
रात्रौ स्ववीर्यमादाय हस्ते कृत्वा तु यत्नतः ॥
वामांगुलिनाच यस्यायः स्त्रियांगुष्ठे निवेशयेत् ॥ ४६ ॥

१२ रुद्रयामलतन्त्रम्
रात्रिको अपना वीर्य हाथमें रखे और वाम अंगुलीसे स्त्रीके अंगुठेमे
लगा दे तो सो वश्य होय ॥४६॥
इज्यर्क्षे च गृहीत्वैव कृष्णतूमरकीलकम् ॥
रविवारे स्पृशेदयां वै सा वशीभूता न संशयः ॥
वंध्या स्त्री सप्तरात्रेण वश्यं याता न संशयः ॥ ४७ ॥
पुष्यनक्षत्रमें कृष्ण धतूरेकी कील रविवारको जिसको छुवा दे सो वश्य
होय । वंध्या स्त्री भी सात रात्रिमें वश होती है ॥४७॥
मंत्रः । ॐ चिमिचिमि स्वाहा ॥
उत्थाय प्रातरेव सुमुखं संमार्जयेच्च ॥
सप्त सप्त च चुलुकां मंत्रितां च पिबेदपः ॥
यस्या नाम ब्रुवेच्चैव वशीभूता न संशयः ॥ ४८ ॥
यह मंत्रपढ़ प्रातःकाल उठ अपना मुख धोवे और सात चुल्लू पानी अभि-
मंत्रित करके जिसका नाम लेके पीवे वह वश्य होय ॥१८॥
ॐ नमः छिप्राकामिनी अमुर्की मे वशमानय स्वाहा ॥ॐ
नागकेशरकं चैव कमलपुष्पं तथैव च ॥
तगरं केशरं चैव जटामासीं वचं तथा ॥ ४९ ॥
यह मंत्र पढ़कर नागकेशर कमलफल तगर केशर जटामासी वच ॥४९॥
समभागे चूर्णयित्वा धूपयेदंगमुत्तमम् ॥
मनसा वा स्मरेद्यां वै सापि वश्या न संशयः ॥५० ॥
बराबर ले चूर्ण कर अपने अंगमें धूप दे मनमें जिस स्त्रीका स्मरण करे
सो वश होय इसमें संशय नहीं ॥५०॥

हिन्दीटीकासहितम् १३
मंत्रः । अमुली महामुली छठछसर्वसंक्षेत्रजेनोपद्रवेभ्यः स्वाहा।
मंत्रेदं मासमेकं च यस्या नाम समन्वितम् ।।
सापि वश्या भवेच्चैव सिद्धियोगो निगद्यते ।। ५१ ।।
इस मंत्रका महीने भर जिसका नाम लेकर जप करे सो वश्य होंय । यह
सिद्धियोग है ।।५१।।
गर्दभस्य शिरस्थीनि स्थापयेन्नरमस्तके ।
घमराप्रभवार्केण रंगयेद्वर्तिकैककाम् ।। ५२ ।।
गदहेके शिरके हाड मनुष्यके कपालमें धर घमराके अर्कमें एक एक बत्ती
रंगे ।।५२।।
स्नेहयुक्तां कपाले च प्रज्वाल्य कृतकज्जलम् ।।
शनौ नेत्रे प्रदातव्यं दर्शनाद्याति वश्यताम् ।। ५३ ।।
और तेल धरकपालमेंदीपबारकज्जलकर शनैश्चरको नेत्रोंमें लगाके
जिसकी ओर देखे सो वश्य होय ।।५३।।
श्वेतगौदरिलेपेन लिंगे चैव विधानतः ।।
ध्रुवेण वश्यतां याति स्त्री च मानवत्यपि सा ।। ५४ ।।
सफेद गौदरिका लेप लिंगमें करे तो निश्चयपूर्वक मानवतीभी वश
होय ।।५४।।
कर्पूरं कृष्णधत्तूरं मूलं पत्रं तथैव च ।।
लिंगलेपनमात्रेण द्रवं याति तदाबला ।। ५५ ।।
कपूर कृष्ण धतूरेके पत्र और जड़का लिंगमें लेपन करे तो स्त्री द्रवे ।।५५।।
कर्पूरं मंदारपुष्पं समभांग च चूर्णयेत् ।।
लिंगलेपनमात्रेण वशीभूता तदाबला ।। ५६ ।।

१४ रुद्रयामलतन्त्रम्
कपूर मदारके फूलका बराबर चूर्णकर लिंगमें लेपन कियेसे स्त्री वश
होय ॥५६॥
स्त्रीद्रावणम् ।
गौर्दारं वारिणा पिष्ट्वा हस्तस्योपरि लेपयेत् ॥
पुरुषस्पर्शमात्रेण स्त्री द्रवति विशेषतः ॥ ५७ ॥
गौदरिको पानीमें पीस हाथके ऊपर लेपन करे तो पुरुषके छूनेसे स्त्री
द्रवे ॥५७॥
मंत्रः । ॐ नमो भगवती उगदामरेशुराह-
द्रवै द्रवै स्त्रीणां पातय स्वाहा ठः ठः ॥
यह मंत्र पढे ॥
यह मंत्र पढ़े ॥
पतिवशीकरणम् ।
कौंडिल्यपक्षिविट् चैव मांसं घृतमलं तथा ॥
योनिलेपनमात्रेण पुरुषो याति वश्यताम् ॥५८ ॥
यह मंत्र पढ़े और कौडिल्लाकी विष्ठा मांसघृतके मैलका योनिमें लेपन
करै तो पुरुष वश होय ॥५७॥
मंत्रः । ॐ काममालिनो ठः ठः स्वाहा ।
सप्तवारं पठेन्मंत्रं गोरोचनसमन्वितम् ॥
मत्स्यपित्तेन संयुक्तं तिलकं च करोति या ॥
वामांगुलिना तर्जयेत्पुरुषो याति वश्यताम् ॥५९ ॥
यह मंत्र सात वार पढ़ गोरोचनमत्स्यपित्तमें मिलाकर स्त्री तिलक करे तो
पुरुष वश्य होय और वाई अंगुरी पुरुषके ओर करे तो भी पुरुष वश्य होय ॥५९॥

हिन्दीटीकासहितम् १५
रजस्वला स्वरुधिरं गोरोचनसमन्वितम् ।।
तिलकं कृत्वा दर्शनात्पुरुषो याति वश्यताम् ।। ६० ।।
रजस्वलास्त्री अपने रुधिरमें गोरोचन मिलाकर तिलक कर जिसकी
ओर चितवे सो पुरुष वश होय ।।६०।।
मंत्रः ।। चामुंडे तरुततु अमुकाय कर्षय आकर्षय स्वाहा
मंत्रेदं दिनसप्तं च त्रिगुणं प्रत्यहं तथा ।। ६१ ।।
जपेत्सहस्रं पुरुषो स्त्रीनामग्रहणात्तथा ।।
मनसा च समाधाय ध्रुवेण याति वै गृहे ।। ६२ ।।
यह मंत्र आकर्षणका इक्कीस रोज हजार हजार जपे और दिनदिन
पुरुष स्त्रीका नाम लेकर मनमें ध्यान करे तो निश्चय स्त्री वश होय ।।६१।।६२।।
रक्तवस्त्रे लिखेद्यंत्रं रक्तचंदनलाक्षया ।।
उत्तराभिमुखो भूत्वा पूजयेत्सुसमाहितः ।। ६३ ।।
रक्तचंदन वा लाखसे उत्तरमुख होकर रक्तवस्त्रमें यंत्र लिखे और
पूजे ।।६३।।
निखनेत्तं पृथिव्यां वै दितानि चैकविंशतिम् ।।
तस्योपरि च सिंचयेत्तंडुलोदकवारिणा ।।
तदायाति मानिनी च वैरिणी चापि दूरतः ।। ६४ ।।
और पृथिवीमें गाड़ इक्कीस दिनतक चावलके धोवनके जलसे सींचे तो
मानवती वैरिणीभी दूरसे आ जाय ।।६४।।
कौहावृक्षस्य वांदां च गृहीत्वाहिरभे विशेषतः ।। ६५ ।।
अजामूत्रेण संपिष्ट्वा यस्याः शिरसि निक्षिपेत् ।।
पुरुषस्य स्त्रियो चापि वश्यतां याति क्षेपणात् ।। ६६ ।।

१६ रुद्रयामलतन्त्रम्
कौहा (अर्जुन) वृक्षका बांदा आश्लेषा नक्षत्रमें ले छेरीके मूत्रमें पीस-
कर क्षेपण करे तो पुरुषके स्त्री और स्त्रीके पुरुष वश होय ।।६५।६६।।
कृष्णसर्पस्य च फणां छित्त्वा चूर्ण समानयेत् ।।
तं चापि धूपयेदंगे नाम गृह्णाति चेति तम् ।। ६७ ।।
कृष्णसर्पकी फणा काटकर चूर्ण कर अंगमें धूप दे जिस स्त्रीका नाम ले
सो उस पुरुषके समीप आवे ।।६७।।
संध्यायां तु समादाय यस्याः पादतलाइ्रजः ।।
वामानाम् समुच्चार्य लक्षमंत्रचतुष्टयम् ।। ६८ ।।
संध्यामें स्त्रीके पादकी धूलि उठाकर वामानाम् ले चार लाख मंत्र जपे
।।६८।।
मंत्रः । ह्रीं हूं अमुकी आकर्षय ।।
जपे मंत्रे समायाति गृहं प्रति न संशयः ।।
घुंघुरनाममंत्रं च जपित्वा पुष्पमाहरेत् ।। ६९ ।।
चेटगस्य फलं चैव पूजयेच्च तदा निशि ।। ७० ।।
यह मंत्र पूर्ण भये पर वह स्त्री गृहको चली आवे इसमें संदेह नहीं और
घुंघुरनाम मंत्र जप कर चेटग वृक्षके फूल फल तोडे और रात्रिमें पूजन करे
।।६९।।७०।।
मंत्रः । अरं घुघुराकृष्टकर्मकर्त्ता अमुकं करोवश्यं ।
भ्रामरौ स्थितौ चैकत्र वियोजयेद्विधानतः ।।
पृथक्पृथक्समानीय चिताकाष्ठेन निर्दहेत् ।। ७१ ।।
यह मंत्र पढ़ भ्रमर भ्रमरी जब इकट्ठे होंय तो उनको न्यारे कर
चिताकी लकड़ीमें जलावे ।।७१।।