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सर्वकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 404, कुल 1855 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 404

पथेव यन्तावनुशासता रजोऽञ्जसा शासता रजः.. (४)
हे शत्रुनाशको! तुम्हारे इन कार्यों को लोग भली प्रकार जानते हैं. तुम स्वर्ग को जाते हो,
इसलिए तुम्हारे रथचालक तुम्हें स्वर्ग के मार्गरूप यज्ञों में ले जाने को रथ तैयार करते हैं एवं
मार्ग के अभाव में भी रथ को नष्ट नहीं करते. हम तीन बंधनों वाले स्वर्णरथ पर सुंदर मार्ग से
स्वर्ग को जाने वाले, शत्रुओं को वश में करने वाले एवं मुख्य रूप से वर्षा का जल बिखेरने
वाले तुमको बैठाते हैं. (४)
शचीभिर्नः शचीवसू दिवा नक्तं दशस्यतम्.
मा वां रातिरुष दसत्कदा चनास्मद्रातिः कदा चन.. (५)
हे कर्मरूप धन के स्वामियो! हमारे यज्ञादि कर्म द्वारा हमें रात-दिन मनचाही वस्तुएं दो.
तुम्हारा एवं हमारा दान कभी भी समाप्त न हो. (५)
वृषन्निन्द्र वृषपाणास इन्दव इमे सुता अद्रिषुतास उद्भिदस्तुभ्यं सुतास उद्भिदः.
ते त्वा मन्दन्तु दावने महे चित्राय राधसे.
गीर्भिर्गिर्वाहः स्तवमान आ गहि सुमृळीको न आ गहि.. (६)
हे कामवर्षक इंद्र! पाषाण खंडों द्वारा कुचलकर निचोड़ा गया यह सोम तुम्हारे पीने के
लिए ही तैयार किया गया है. पर्वत पर उत्पन्न होने वाला सोम तुम्हारे निमित्त निचोड़ा गया है.
अभिमतदान, महान् एवं विचित्र धन प्राप्ति के लिए दिया गया सोम तुम्हें प्रसन्न करे. हे
स्तुतिधारक! हमारी स्तुतियां सुनकर हमारे ऊपर प्रसन्न होते हुए आओ. (६)
ओ षू णो अग्ने शृणुहि त्वमीळितो देवेभ्यो ब्रवसि यज्ञियेभ्यो राजभ्यो यज्ञियेभ्यः.
यद्ध त्यामङ्गिोभ्यो धेनुं देवा अदत्तन.
वि तां दुहे अर्यमा कर्तरी सचाँ एष तां वेद मे सचा.. (७)
हे अग्नि! तुम हमारे द्वारा स्तुत होकर हमारा आह्वान सुनो. तुम यज्ञ के योग्य एवं
तेजस्वी देवों को यजमान के यज्ञकर्मों की सूचना देना. देवों ने अंगिरागोत्रीय ऋषियों को
प्रसिद्ध गाय दी थी. अर्यमा ने अन्य देवों के साथ अग्नि के लिए उस गाय को दुहा. वे अर्यमा
उस गाय को तथा मुझे जानते हैं. (७)
मो षु वो अस्मदभि तानि पौंस्या सना भूवन्द्युम्नानि मोत जारिषुरस्मत्पुरोत जारिषुः.
यद्धश्वित्रं युगेयुगे नव्यं घोषादमर्त्यम्.
अस्मासु तन्मरुतो यच्च दुष्टरं दिधृता यच्च दुष्टरम्.. (८)
हे मरुतो! तुम्हारी प्रसिद्ध, नित्य एवं प्रकाशयुक्त शक्ति हमसे कभी दूर न जाए. हमारा
यश एवं हमारे नगर जीर्ण न हों. तुम्हारी विचित्र, नवीन एवं शब्द करने वाली वस्तुएं हमें युग-
युग में प्राप्त हों. दुःख से प्राप्त करने योग्य एवं शत्रुओं द्वारा नष्ट न होने वाला जो धन है, वह
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