ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 183, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रातर्युजा वि बोधयाश्विनावेह गच्छताम्. अस्य सोमस्य पीतये.. (१)
हे अध्वर्यु! प्रातःसवन नामक यज्ञ से संबंधित अश्विनीकुमारों को जगाओ. वे सोमपान
करने के लिए इस यज्ञ में आवें. (१)
या सुरथा रथीतमॊभा देवा दिविस्पृशा. अश्विना ता हवामहे.. (२)
हम अश्विनीकुमारों को यज्ञ में बुलाते हैं. उनका रथ सुंदर है और वे रथियों में अत्यंत
श्रेष्ठ हैं. (२)
या वां कशा मधुमत्यश्विना सूनृतावती. तया यज्ञं मिमिक्षतम्.. (३)
हे अश्विनीकुमारो! तुम्हारे चाबुक से घोड़ों के पसीने की गंध आती है और वह शब्द के
साथ चोट करता है. ऐसे चाबुक से घोड़ों को हांकते हुए तुम यज्ञ में शीघ्र आकर इसे सोमरस
से सींच दो. (३)
नहि वामस्ति दूरके यत्रा रथेन गच्छथः. अश्विना सोमिनो गृहम्.. (४)
हे अश्विनीकुमारो! तुम अपने रथ में बैठकर सोमरस पीने के लिए यजमान के जिस घर
की दिशा में जा रहे हो, वह घर दूर नहीं है. (४)
हिरण्यपाणिमूतये सवितारमुप ह्वये. स चेत्ता देवता पदम्.. (५)
सूर्य के हाथ में स्वर्ण है. मैं उन्हें रक्षा के लिए बुलाता हूं. वे सूर्य देव यजमान को प्राप्त
होने वाला पद बता देंगे. (५)
अपां नपातमवसे सवितारमुप स्तुहि. तस्य व्रतान्युश्मसि.. (६)
सूर्य जल को सुखा देता है. अपनी रक्षा के लिए उस सूर्य की स्तुति करो. हम सूर्य के
लिए यज्ञ करना चाहते हैं. (६)
विभक्तारं हवामहे वसोश्चित्रस्य राधसः. सवितारं नृचक्षसम्.. (७)
सूर्य धन में निवास करते हैं. वे सुवर्ण, रजतादि रूप धन यजमानों में उचित रूप से
बांटते हैं. हम मनुष्यों को प्रकाश देने वाले सूर्य का आह्वान करते हैं. (७)
सखाय आ नि षीदत सविता स्तोम्यो नु नः. दाता राधांसि शुम्भति.. (८)
हे मित्रो! चारों ओर ठीक से बैठ जाओ. हमें शीघ्र ही सूर्य की स्तुति करनी है. धन देने
वाले सूर्य सुशोभित हो रहे हैं. (८)
अग्ने पत्नीरिहा वह देवानामुशतीरुप. त्वष्टारं सोमपीतये.. (९)
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