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सर्वकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 1307, कुल 1855 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1307

हे राजा सोम! हमें विनाशरहित बनाने के लिए सुखी करो. व्रतधारी हम तुम्हारे ही हैं,
इसे जानो. हे इंद्र! हमारा शत्रु क्रोध में भरा हुआ एवं वृद्धि प्राप्त करके जा रहा है. इसके क्रोध
से हमारा उद्धार करो. (८)
त्वं हि नस्तन्वः सोम गोपा गात्रेगात्रे निषसत्था नृचक्षाः.
यत्ते वयं प्रमिनाम व्रतानि स नो मृळ सुषखा देव वस्यः.. (९)
हे सोम! तुम हमारे शरीर के रक्षक यज्ञकर्म के प्रत्येक अंग के नेताओं को देखने वाले
एवं बैठने वाले हो. हे देव! हम तुम्हारे व्रतों में विघ्न डालते हैं, फिर भी तुम उत्तम मित्र एवं
श्रेष्ठ अन्न वाले बनकर हमें सुखी करो. (९)
ऋदूदरेण सख्या सचेय यो मा न रिष्येद्धर्यश्व पीतः.
अयं यः सोमो न्यधाय्यस्मे तस्मा इन्द्रं प्रतिरमेम्यायुः.. (१०)
मैं उदर को बाधा न पहुंचाने वाले सखा सोम से मिलूंगा. पिए हुए सोम मेरी हिंसा न
करें. हे हरि नामक अश्वों वाले इंद्र! मैं याचना करता हूं कि पिया हुआ सोम चिरकाल तक
हमारे उदर में रहे. (१०)
अप त्या अस्थुरनिरा अमीवा निरत्रसन्तमिषीचीरभैषुः.
आ सोमो अस्माँ अरुहद्विहाया अगन्म यत्र प्रतिरन्त आयुः.. (११)
कठिनता से हटने वाली एवं दृढ़ पीड़ाएं दूर हों. वे पीड़ाएं शक्तिशालिनी बनकर हमें
कंपित और भयभीत करती हैं. महान् सोम हमारे समीप आया है. जिस सोम के पीने से
हमारी आयु बढ़ती है, उसे हम प्राप्त करें. (११)
यो न इन्दुः पितरो हृत्सु पीतोऽमर्त्यो मर्त्याँ आविवेश.
तस्मै सोमाय हविषा विधेम मृळीके अस्य सुमतौ स्याम.. (१२)
हे पितरो! जो मरणरहित सोम पिए जाने पर हम मानवों के हृदय में प्रविष्ट हुआ है, हम
हव्यधारणकर्त्ता यजमान उसी सोम की सेवा करेंगे एवं उसकी कृपा दृष्टि में रहेंगे. (१२)
त्वं सोम पितृभिः संविदानोऽनु द्यावापृथिवी आ ततन्थ.
तस्मै त इन्दो हविषा विधेम वयं स्याम पतयो रयीणाम्.. (१३)
हे सोम! तुम पितरों के साथ मिलकर द्यावा-पृथिवी का विस्तार करते हो. हम हवि के
द्वारा तुम्हारी सेवा करें एवं धन के स्वामी बनें. (१३)
त्रातारो देवा अधि वोचता नो मा नो निद्रा ईशत मोत जल्पिः.
वयं सोमस्य विश्वह प्रियासः सुवीरासो विदथमा वदेम.. (१४)
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