ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 1301, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंवश ने कहा—"मैंने अश्वपुत्र पृथुश्रवा से साठ हजार एवं दस हजार घोड़े, बीस सौ ऊंट,
काले रंग की दस घोड़ियां एवं तीन जगहों पर भूरे रंग वाली दस हजार गाएं पाई हैं. (२२)
दश श्यावा ऋधद्रयो वीतवारास आशवः. मश्रा नेमिं नि वावृतुः.. (२३)
शत्रु को मारने वाले, अधिक वेग वाले व अति शक्तिशाली दस हजार काले रंग के घोड़े
रथ का पहिया आगे खींचते हैं. (२३)
दानासः पृथुश्रवसः कानीतस्य सुराधसः.
रथं हिरण्ययं ददन् मंहिष्ठः सूरिरभूदृषिषमकृत श्रवः.. (२४)
शोभन धन वाले, कन्यापुत्र पृथुश्रवा का दान यही है. उन्होंने सोने का रथ दिया है,
अतिशय दाता एवं सबके प्रेरक पृथुश्रवा ने अधिक बढ़ी हुई कीर्ति प्राप्त की है. (२४)
आ नो वायो महे तने याहि मखाय पाजसे.
वयं हि ते चकृमा भूरि दावने सद्यश्चिन्महि दावने.. (२५)
हे वायु! तुम महान् धन एवं पूज्य बल देने के लिए हमारे पास आओ. हम अधिक धन
देने वाले तुम्हारी स्तुति उसी समय करते हैं. (२५)
यो अश्वेभिर्वहते वस्त उस्रास्त्रिः सप्त सप्ततीनाम्.
एभिः सोमेभिः सोमसुद्भिः सोमपा दानाय शुक्रपूतपाः.. (२६)
हे सोमरस पीने वाले एवं दीप्ति तथा पवित्र सोमरस पीने वाले वायु! अश्वों द्वारा चलने
वाले, गृह में निवास करने वाले एवं चौदह सौ सत्तर गायों के साथ चलने वाले पृथुश्रवा तुम्हें
सोमरस देने के लिए ही सोमरस निचोड़ने वालों के साथ मिले हैं. (२६)
यो म इमं चिदु त्मनामन्दच्चित्रं दावने.
अष्ट्वे अक्षे नहुषे सुकृत्वनि सुकृत्तराय सुक्रतुः.. (२७)
जो पृथुश्रवा दान की वस्तुओं—गायों, घोड़ों आदि के विषय में सोचकर मन ही मन
प्रसन्न हुए थे, उन शोभन कर्म वाले ने अपने राज्य के अध्यक्षों—अष्ट्व, अक्ष, नहुष एवं
सुकृत्य को उत्तम कर्म करने की आज्ञा दी. (२७)
उचथ्ये३ वपुषि यः स्वराळुत वायो घृतस्नाः.
अश्वेषितं रजेषितं शुनेषितं प्राज्म तदिदं नु तत्.. (२८)
हे वायु! जो पृथुश्रवा उचथ्य एवं वयु नामक राजाओं से भी अधिक सुशोभित हैं एवं घृत
के समान शुद्ध हैं, उन्होंने घोड़ों, गधों और कुत्तों पर लादकर जो अन्न भेजा है, वह यही है,
यह सब तुम्हारी कृपा है. (२८)
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