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रत्नावली नाटिका (सम्राट हर्षवर्धन - शास्त्रीय नाटिका रत्न सम्पूर्ण ४ अङ्क सान्वय सटीक)

रत्नावली नाटिका (सम्राट हर्षवर्धन - शास्त्रीय नाटिका रत्न सम्पूर्ण ४ अङ्क सान्वय सटीक)

Ratnavali Natika of Emperor Harsha with Commentary

सम्राट हर्षवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished520 पृष्ठ

पृष्ठ 349, कुल 520 में से

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पृष्ठ 349

304 रत्नावली
˘ ˘ - - - ˘ - ˘ - - -
2nd line = न त था दो बा ध ते य था स ङ्गे
१ १ २ २ २ १ २ १ २ २ २ = 18 मात्राs

    • ˘ ˘ - ˘ - ˘ ˘ -
      4th line = अ भ्य ङ्ग ज ला ग मो दि व सः
      २ २ १ १ २ १ २ १ १ २ = 15 मात्राs
      N. B. The short vowel is equal to 1 mátrá and the long
      one to 2 mátrás (measures or units of time in pronunciation).
      The figure of speech is प्रतिवस्तूपमा which is defined as :—
      “... ... प्रतिवस्तूपमा तु सा ।
      सामान्यस्य द्विरेकस्य यत्र वाक्यद्वये स्थितिः” ॥ काः प्रः -१०।१०१-१०२
      Here two सामान्यधर्मs बाधन and ऽतापन, respectively of शरत्सन्तापः
      and अभ्यङ्गजलागमो दिवसः which are उपमेय and उपमान respectively,
      mean the same thing under different wordings. Barring this
      much this figure of speech corresponds to दृष्टान्त ।
      Ch. of Voice :—तीव्रेण शरत्सन्तापेन ... बाध्यते ... तप्यते ... अभ्यङ्गजला-
      गमेन दिवसेन ॥१०॥
      उत्कण्ठानिर्भरम्—Adv. निः निःशेषेण भरः यस्मिन् ( बहु ) तत् यथा स्यात्
      तथा = निर्भरम् ; उत्कण्ठया निर्भरम् ( ३यातत् ) । निर्भरम्—means निरतिशयम्—
      excessively—“अतिवेलभृशात्यर्थातिमात्रोद्गाढनिर्भरम्”—अमरः । उत्कण्ठा is
      defined as “रागे त्वलब्धविषये वेदना महती तु या । संशोषणी तु गात्राणां
      तामुत्कण्ठां विदुर्बुधाः” ।
      P. 251. सभ्रुभङ्गम्—with frowning. भ्रुवः भङ्गः ( ६तीतत् ) तेन सह
      विद्यमानम् ( बहु ) ।
      Shloka 11. The King here identifies different limbs of
      the supposed Ságariká with different cooling materials
      whence he expects relief of his love-sicken self.
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